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Wednesday, 13 February 2013
Tuesday, 5 February 2013
Ashtmesh ka vibhinn bhav gat fal...
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:अष्टमेश की अन्य भावों में स्थिति .....
अष्टमेश प्रथम भाव (लग्न) में हो तो जातक के हर कार्य में विघ्न आते हैं ....ऐसा जातक लम्बे समय तक चलने वाली बीमारी से पीड़ित रहता है ...पाप कर्मों के प्रति उसकी रूचि रहती है और वह पापकर्मा होता भी है फलत: सर्वत्र उसकी निंदा होती है ऐसा जातक प्रसिद्द चोर होता है उसके शारीर पर अनेक व्रण (घावों) के निशान होते हैं देव-गुरु- ब्राह्मण अर्थात समाज के प्रतिष्ठित विद्वजनों से उसका बैर रहता है ...अपने किसी बड़ो की सलाह नहीं मानता उनका अनादर करता है उसे देह सुख अप्ल मिलता है लेकिन किसी उपलक्ष्य में उसे राज्य पक्ष से धन लाभ भी होता है ...अनेक दुखो को भोगता हुआ ऐसा जातक सहनशील होता है..
अष्टमेश का द्वितीय (धन) भाव में होने से जातक क्षीण आयु तथा अनेको शत्रुओ से युक्त होता है ऐसा जातक प्राय: शुभ कर्मो से रहित और नीच कर्मो से धन अर्जित कर अभिमान करने वाला समाज से त्याज्य होता है जैसा की पहले बताया गया है की कुंडली में अष्टम भाव सबसे ज्यादा पापी भाव होता है अत: यहाँ स्थित राशी, गृह पर उसका पपत्व का असर पड़ता है ...शुभ गृह हो और शुभ राशी, मित्र राशी...उच्च अथवा स्व राशी में हो तो पाप प्रभाव में कमी होती है इसके बावजूद उसे राज्य पक्ष से दंड का भय बना रहता है..शत्रुओं की गतिविधियों से उसे बहुत हानि होती है, मान-अपमान का भी रहता है...और समाज से उसे यथा योग्य सम्मान प्राप्त नहीं होता....क्रमश: शिव ॐ...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम: अष्टमेश तीसरे भाव में .........
यदि तीसरे भाव में अष्टमेश हो तो जताक अपने बंधू-बंधवो तथा सगोत्रियो से ईर्ष्या रखता है ऐसे जातक को सहोदरों का सुख नहीं मिल पता ...भाई या तो होते नहीं यदि हो भी तो आपस में बनती नहीं उनका शारीर भी कमजोर होता है तथा उस पर अधिक पाप प्रभाव हो तो जातक विकलांग भी हो सकता है अनेक रोगों से त्रस्त रहने वाला ऐसा जातक सहानुभूति नहीं ले पता...ऐसा जातक सदा दुर्वचन बोलता हैजिसके कारन वह लोगो की दृष्टि में निंदनीय होता है चूँकि सहोदरों से या कुटुंब के एनी भाई बंधवो से मतभेद के चलते ...ऐसा जातक बलहीन कहलाता है...दोस्तों शक्ति तीन होती हैं ...धन बल, देह बल, और सामाजिक बल ...जिस जातक के अपने सगे भाई नहीं होते और अन्य बांधवो से मतभेद होते हैं वो समाज में बलहीन होता है ...और वो सुरक्षित भी नहीं होता..
अष्टमेश अगर सुख भाव (चतुर्थ ) में हो तो सुख की आशा करना निराधार है ...ऐसे जातक का अपने पिता से व्यर्थ में विवाद हो कर बैर हो जाता है तथा उसे वहां सुख नहीं मिल पता...वह पिता की संपत्ति को नष्ट कर देता है ..यदि अष्टमेश पाप प्रभाव में आया हो तो पिता-पुत्र में मल्ल युद्ध की नौबत आ जाती है और दोनों न्यायालय में पहुँच जाते हैं ...ऐसा जातक अपने मित्रो तक को नहीं चोदता और उनसे भी द्रोह रखता हैस्वभाव से उग्र होने के कारण प्रत्येक से झगडा करता है यदि शुभ हो या शुभ प्रभाव में हो तो उपरोक्त अशुभता में कमी आती है
ॐश्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:सप्तम भाव में अष्टमेश के जाने से जातक प्रवास में कष्ट पाता है ...ऐसा जातक बड़े भाई के लिए कष्टप्रद होता है ..वह कामुक होता है तथा प्रमेह, शुक्रमेह, उपदंश आदि रोगों से पीड़ित होता है...ऐसा जातक का स्त्री से वैमनस्य बना रहता है....वह कम पिपासा को शांत करने के लिए व्यभिचार का सहारा लेता है ...उदार रोगों से पीड़ित रहता है..स्वयम मुर्ख होता है तथा दुष्टों से इसकी सांगत और मित्रता रहती है...ऐसे जातक की दुष्ट स्त्री के कारन मृत्यु तक संभव है...अर्श, भगंदर, जिअसे गुदा रोग होते हैं....व्यापर में हानि होती है ..यदि नौकरी करता हो तो पदावनति होने की प्रबल सम्भावना होती है...ऐसे जातक का द्विभार्या योग बनता है ..यदि शुभ प्रभाव में हो तो थोड़े बहुत शुभ फल अवश्य मिलते हैं....
अष्टमेश यदि अष्टम में ही हो तो जातक प्राय: निरोगी होता है ...अर्थ वो किसी दीर्घकालीन रोगों से त्रस्त नहीं होता...उसके कार्य व्यवसाय में प्रगति होती है धन और मन दोनों मिल जाते हैं तथा लम्बी आयु का उपभोग करता हुआ....प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेता अहि यदि अष्टमेश अशुभ प्रबह्व में आया हो अथवा अकरक हो तो देव, गुरु सज्जन पुरषों की निंदा करने वाला, सज्जन पुरशो अतःवा अपने से बड़ो का कहा न मानने वाला , स्त्री पुत्र सुख से हीन, यात्रा में दुर्घटना अथवा कष्ट पाने वाला पापकर्म, चौर्य्कला में निपुण, परे स्त्री से प्रेम करने वाल तथा अपयशी होता है...क्रमश: !!शिव ॐ!!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
यदि अष्टमेश नवम भाव में गया हो तो जातक देव, गुरु, और सद्जनों की संगती में नहीं रहता ...ऐसा जातक धरम-कर्म को ढोंग की संज्ञा देता है...जातक पक्का नास्तिक, पाप कर्मों में रत , जीवों की हिंसा करने वाला, बंधू-बांधवों से रहित व स्नेह रहित होता है ...ऐसे जातक को पत्नी भी दु:शीला मिलती है दुसरे के धन को हरण में पति-पत्नी दोनों का दिमाग एक साथ काम करता है ...ऐसा जातक छल-फरेब, दुसरे की धन संपत्ति को हरण करने में चतुर होते हैं ...यदि अष्टमेश शुभ गृह तो शुभ फल मिलते हैं ...तथा किसी वसीयत द्वारा संपत्ति प्राप्त होती है ...
यदि अष्टमेश दशम भाव में हो तो जातक अलसी होता है तथा उसे माता-पिता का सुख प्राय: नहीं मिलता..यदि अष्टमेश अत्यधिक पाप प्रभाव में हो तो माता का चरित्र संदिग्ध होता है...चुगली करने की उसकी आदत होती है...दूसरों में विद्वेष पैदा कर अपन उल्लू सीधा करता है ...इन्ही कारणों से लोग उस से घृणा करते हैं..ऐसे जातक को राज्य दंड मिलने की प्रबल सम्भावना होती है दशम भाव के शुभ फलों में भरी कमी होती है ......ऐसा जातक अपने लाभ के लिए नित्य नवीन योजनायें बनता रहता है..यदि अष्टमेश शुभ ग्रह हो और शुभ प्रबह्व में हो तो ..ऐसा जातक खोजी प्रवृत्ति का होता है...समाजोपयोगी खोज कर जगत में अपना नाम करता है ....इति शुभ...शिव ॐ...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम: अष्टमेश दशम भाव में...फल
यदि अष्टम भाव का स्वामी एकादश में हो जातक कार्य-व्यवसाय में सफलता प्राप्त कर लेता है उसे धन-मन-सम्मान सभी कुछ प्राप्त हो जाता है...इष्ट मित्र अच्छे होते हैं तथा समय पर सहायता भी करते हैं...ऐसे जातक का माता से प्राय: वैमनस्य बना रहता है उसे यात्राओं में प्राय: कष्ट मिलता है तथा बाल्यावस्था सुखकर नहीं बीतती. ..लेकिन बाद में सुख मिलता है यदि अष्टमेश पाप प्रभाव में आया हो तो जातक अल्पायु होता है किये गए कर्मों का उसे पूरा लाभ नहीं मिलता तथा उसके इष्ट मित्र उसे धोखा देते हैं.....
यदि अष्टमेश बारहवें भाव में हो तो जातक की वाणी कर्कश होती है ऐसा जातक चौर्ये कला में निष्णात , बुरे कर्म करने वाला अल्पायु तथा आत्म ज्ञान से हीन होता है...ऐसे जातक के जन्म से ही उसका कोई अंग क्षीण होता है...या बाद में की दुर्घटना के कारन उसके किसी अंग में शिथिलता आ जाती है...आईटीआई अष्टमेश विभिन्न भावगत फलं सम्पूर्णं....शिव ॐ...
अष्टमेश प्रथम भाव (लग्न) में हो तो जातक के हर कार्य में विघ्न आते हैं ....ऐसा जातक लम्बे समय तक चलने वाली बीमारी से पीड़ित रहता है ...पाप कर्मों के प्रति उसकी रूचि रहती है और वह पापकर्मा होता भी है फलत: सर्वत्र उसकी निंदा होती है ऐसा जातक प्रसिद्द चोर होता है उसके शारीर पर अनेक व्रण (घावों) के निशान होते हैं देव-गुरु- ब्राह्मण अर्थात समाज के प्रतिष्ठित विद्वजनों से उसका बैर रहता है ...अपने किसी बड़ो की सलाह नहीं मानता उनका अनादर करता है उसे देह सुख अप्ल मिलता है लेकिन किसी उपलक्ष्य में उसे राज्य पक्ष से धन लाभ भी होता है ...अनेक दुखो को भोगता हुआ ऐसा जातक सहनशील होता है..
अष्टमेश का द्वितीय (धन) भाव में होने से जातक क्षीण आयु तथा अनेको शत्रुओ से युक्त होता है ऐसा जातक प्राय: शुभ कर्मो से रहित और नीच कर्मो से धन अर्जित कर अभिमान करने वाला समाज से त्याज्य होता है जैसा की पहले बताया गया है की कुंडली में अष्टम भाव सबसे ज्यादा पापी भाव होता है अत: यहाँ स्थित राशी, गृह पर उसका पपत्व का असर पड़ता है ...शुभ गृह हो और शुभ राशी, मित्र राशी...उच्च अथवा स्व राशी में हो तो पाप प्रभाव में कमी होती है इसके बावजूद उसे राज्य पक्ष से दंड का भय बना रहता है..शत्रुओं की गतिविधियों से उसे बहुत हानि होती है, मान-अपमान का भी रहता है...और समाज से उसे यथा योग्य सम्मान प्राप्त नहीं होता....क्रमश: शिव ॐ...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम: अष्टमेश तीसरे भाव में .........
यदि तीसरे भाव में अष्टमेश हो तो जताक अपने बंधू-बंधवो तथा सगोत्रियो से ईर्ष्या रखता है ऐसे जातक को सहोदरों का सुख नहीं मिल पता ...भाई या तो होते नहीं यदि हो भी तो आपस में बनती नहीं उनका शारीर भी कमजोर होता है तथा उस पर अधिक पाप प्रभाव हो तो जातक विकलांग भी हो सकता है अनेक रोगों से त्रस्त रहने वाला ऐसा जातक सहानुभूति नहीं ले पता...ऐसा जातक सदा दुर्वचन बोलता हैजिसके कारन वह लोगो की दृष्टि में निंदनीय होता है चूँकि सहोदरों से या कुटुंब के एनी भाई बंधवो से मतभेद के चलते ...ऐसा जातक बलहीन कहलाता है...दोस्तों शक्ति तीन होती हैं ...धन बल, देह बल, और सामाजिक बल ...जिस जातक के अपने सगे भाई नहीं होते और अन्य बांधवो से मतभेद होते हैं वो समाज में बलहीन होता है ...और वो सुरक्षित भी नहीं होता..
अष्टमेश अगर सुख भाव (चतुर्थ ) में हो तो सुख की आशा करना निराधार है ...ऐसे जातक का अपने पिता से व्यर्थ में विवाद हो कर बैर हो जाता है तथा उसे वहां सुख नहीं मिल पता...वह पिता की संपत्ति को नष्ट कर देता है ..यदि अष्टमेश पाप प्रभाव में आया हो तो पिता-पुत्र में मल्ल युद्ध की नौबत आ जाती है और दोनों न्यायालय में पहुँच जाते हैं ...ऐसा जातक अपने मित्रो तक को नहीं चोदता और उनसे भी द्रोह रखता हैस्वभाव से उग्र होने के कारण प्रत्येक से झगडा करता है यदि शुभ हो या शुभ प्रभाव में हो तो उपरोक्त अशुभता में कमी आती है
ॐश्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:सप्तम भाव में अष्टमेश के जाने से जातक प्रवास में कष्ट पाता है ...ऐसा जातक बड़े भाई के लिए कष्टप्रद होता है ..वह कामुक होता है तथा प्रमेह, शुक्रमेह, उपदंश आदि रोगों से पीड़ित होता है...ऐसा जातक का स्त्री से वैमनस्य बना रहता है....वह कम पिपासा को शांत करने के लिए व्यभिचार का सहारा लेता है ...उदार रोगों से पीड़ित रहता है..स्वयम मुर्ख होता है तथा दुष्टों से इसकी सांगत और मित्रता रहती है...ऐसे जातक की दुष्ट स्त्री के कारन मृत्यु तक संभव है...अर्श, भगंदर, जिअसे गुदा रोग होते हैं....व्यापर में हानि होती है ..यदि नौकरी करता हो तो पदावनति होने की प्रबल सम्भावना होती है...ऐसे जातक का द्विभार्या योग बनता है ..यदि शुभ प्रभाव में हो तो थोड़े बहुत शुभ फल अवश्य मिलते हैं....
अष्टमेश यदि अष्टम में ही हो तो जातक प्राय: निरोगी होता है ...अर्थ वो किसी दीर्घकालीन रोगों से त्रस्त नहीं होता...उसके कार्य व्यवसाय में प्रगति होती है धन और मन दोनों मिल जाते हैं तथा लम्बी आयु का उपभोग करता हुआ....प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेता अहि यदि अष्टमेश अशुभ प्रबह्व में आया हो अथवा अकरक हो तो देव, गुरु सज्जन पुरषों की निंदा करने वाला, सज्जन पुरशो अतःवा अपने से बड़ो का कहा न मानने वाला , स्त्री पुत्र सुख से हीन, यात्रा में दुर्घटना अथवा कष्ट पाने वाला पापकर्म, चौर्य्कला में निपुण, परे स्त्री से प्रेम करने वाल तथा अपयशी होता है...क्रमश: !!शिव ॐ!!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
यदि अष्टमेश नवम भाव में गया हो तो जातक देव, गुरु, और सद्जनों की संगती में नहीं रहता ...ऐसा जातक धरम-कर्म को ढोंग की संज्ञा देता है...जातक पक्का नास्तिक, पाप कर्मों में रत , जीवों की हिंसा करने वाला, बंधू-बांधवों से रहित व स्नेह रहित होता है ...ऐसे जातक को पत्नी भी दु:शीला मिलती है दुसरे के धन को हरण में पति-पत्नी दोनों का दिमाग एक साथ काम करता है ...ऐसा जातक छल-फरेब, दुसरे की धन संपत्ति को हरण करने में चतुर होते हैं ...यदि अष्टमेश शुभ गृह तो शुभ फल मिलते हैं ...तथा किसी वसीयत द्वारा संपत्ति प्राप्त होती है ...
यदि अष्टमेश दशम भाव में हो तो जातक अलसी होता है तथा उसे माता-पिता का सुख प्राय: नहीं मिलता..यदि अष्टमेश अत्यधिक पाप प्रभाव में हो तो माता का चरित्र संदिग्ध होता है...चुगली करने की उसकी आदत होती है...दूसरों में विद्वेष पैदा कर अपन उल्लू सीधा करता है ...इन्ही कारणों से लोग उस से घृणा करते हैं..ऐसे जातक को राज्य दंड मिलने की प्रबल सम्भावना होती है दशम भाव के शुभ फलों में भरी कमी होती है ......ऐसा जातक अपने लाभ के लिए नित्य नवीन योजनायें बनता रहता है..यदि अष्टमेश शुभ ग्रह हो और शुभ प्रबह्व में हो तो ..ऐसा जातक खोजी प्रवृत्ति का होता है...समाजोपयोगी खोज कर जगत में अपना नाम करता है ....इति शुभ...शिव ॐ...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम: अष्टमेश दशम भाव में...फल
यदि अष्टम भाव का स्वामी एकादश में हो जातक कार्य-व्यवसाय में सफलता प्राप्त कर लेता है उसे धन-मन-सम्मान सभी कुछ प्राप्त हो जाता है...इष्ट मित्र अच्छे होते हैं तथा समय पर सहायता भी करते हैं...ऐसे जातक का माता से प्राय: वैमनस्य बना रहता है उसे यात्राओं में प्राय: कष्ट मिलता है तथा बाल्यावस्था सुखकर नहीं बीतती. ..लेकिन बाद में सुख मिलता है यदि अष्टमेश पाप प्रभाव में आया हो तो जातक अल्पायु होता है किये गए कर्मों का उसे पूरा लाभ नहीं मिलता तथा उसके इष्ट मित्र उसे धोखा देते हैं.....
यदि अष्टमेश बारहवें भाव में हो तो जातक की वाणी कर्कश होती है ऐसा जातक चौर्ये कला में निष्णात , बुरे कर्म करने वाला अल्पायु तथा आत्म ज्ञान से हीन होता है...ऐसे जातक के जन्म से ही उसका कोई अंग क्षीण होता है...या बाद में की दुर्घटना के कारन उसके किसी अंग में शिथिलता आ जाती है...आईटीआई अष्टमेश विभिन्न भावगत फलं सम्पूर्णं....शिव ॐ...
Ashtmashth vibhinn grah fal..
अष्टमस्थ विभिन्न ग्रहों का फल अष्टमस्थ सूर्य ..........
अष्टम भाव में किसी भी क्रूर और पापी ग्रहों की स्थिति शुभ नहीं मानी गई है ...जातक को अपने जीवन में मृत्यु तुल्य कष्टों अवरोधों की स्थिति का सामना करना पड सकता है ...प्राचीन ग्रंथकारों ने अष्टमस्थ सूर्य के अशुभ फल ही बताएं हैं....लेकिन अनुभव में शुभाशुभ दोनों प्रकार के फलों को देखा गया है...यदि सूर्य पुरुष राशी...मुख्यतया अग्नि राशियों में हो तो बुरे फल मिलते हैं...घर की गुप्त बातें, जिनका दूसरों को ज्ञान हो जाना अहितकर होता है घर से बहार चली जाती हैं...नौकर-चाकर विश्वस्त नहीं होते ...यहाँ तक की अपनी पत्नी भी विश्वासपात्र नहीं रहती ...ऐसे में पारी या पत्नी कोई विश्वासघात करे तो क्या आश्चर्य ..यदि सूर्य स्व-राशी अथवा उच्च का हो तो असावधानीवश जातक की मृत्यु होती है ...यदि सूर्य वृश्चिक, मकर, कुम्भ, तुला, वृषभ या कन्या राशी में हो तो जातक को लम्बी बीमारियाँ भोग कर मृत्यु का आलिंगन करना पड़ता है ...उसके जीवन साथी का चरित्र संदिग्ध रहता है...तथा मृत्यु भी जीवन साथी से पहले हो जाती है...जीवन के अंतिम दिनों में जातक को अर्थाभाव झेलना पड़ता है ..यह सब ऐसे ही होता है जैसे सूर्यास्त के बाद का अँधेरा ...सूर्य के स्त्री राशी में रहने से संतति सुख अधिक मिलता है ..पुरुष राशी में संतान सुख अल्प होता है दृष्टि मंदता से परेशानी होती ...ज्यादा पापा प्रभव में सूर्य हो तो आँख का ओप्रेसन भी होता है ...अधिक स्त्री प्रसंग के कारण उसे गुप्त रोगों का शिकार होना पड़ता है!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ भावस्थ चन्द्रमा.....
यदि अष्टमस्थ चन्द्र हो तो बचपन में अरिष्ट होता है ...कई प्रकार के रोगों से जातक ग्रस्त रहता है...अनेक चिकित्सकों से निदान करने पर भी व्याधियां उसका पीछा नहीं छोडती उसे जल में डूबने का भय रहता है...अथवा जलोदर रोग उसकी मृत्यु का कारन बनता है यह प्राय: बाल्यकाल में ही घटित हो जाता है क्यूंकि अरिष्ट्प्रद चंद्रमा बच्चों के लिए ही ज्यादा कष्टदायी रहता है......यदि अग्नि राशी का चंद्रमा हो तो येन-केन-प्रकारेण जातक को धन मिल जाता है...विवाह में भी अच्छा दान -दहेज़ मिल जाता है...या किसी के द्वारा वारिस घोषित होने से धन-संपत्ति मिल जाती है ..यदि चन्द्र वायु राशी में हो तो जीवन साथी अच्चा मिलता है...लेकिन परिवार में कलह बनी रहती है....ऐसा जातक योगाभ्यासी , वेदांत को जानने वाला व इश्वर की उपासना करने वाल होता है उसके घर की गुप्त बातें दूसरों को नौकरों के द्वारा अथवा पत्नी के द्वारा ज्ञात हो जाती हैं ४५ वे वर्ष से सम्पत्तिनाशक योग बनते हैं....लेकिन यदि चंद्रमा उच्च या स्वग्रही हो तो शुभ फल मिलते हैं....
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ मंगल फलम
यदि अष्टम भाव में मंगल हो तो जातक प्राय: रोगों से ग्रस्त रहता है ! उसे देहसुख अच्छा नहीं मिलता तथा वह अल्पायु एवं दरिद्री अथवा अभावग्रस्त रहता है.. जातक की बोलचाल बहुत रुखी..और असभ्य होती है...ऐसा जातक स्वार्थी और कंजूस भी होता है शायद जीवन की कठिनाई उसे ऐसा करने पर विवास करती हो ...अनभव में आय अ है की ऐसे जातक का मध्य कल निर्धनावस्था में व्यतीत होता है प्राचीन महाऋषियों ने कहा है की अष्टम में अगर मंगल विराजमान हो तो उसके लिए शुभ स्थानों में बैठे शुभ गृह भी लाभ नहीं देते...विवाह से लाभ नहीं होता ..उलटे परेशानियाँ बढती है ...मित्र शत्रुवत व्यव्हार करते हैं यदि मंगल नीच राशी में हो तो रक्त-पित्त हो जाता है ...सूर्य चंद्रमा और शनि के साथ यदि मंगल भी अशुभ सम्बन्ध में हो तो जातक अल्पायु होता है अथवा किसी षट्कर्म के कारण उसकी मृत्यु होती है...यदि अकेला मंगल हो तो शीघ्र मृत्यु नहीं होने देता...
यदि मंगल अग्नि राशी में हो तो जातक की आग से जल कर मृत्यु होती है अथवा किसी गोली या विस्फोटक पदार्थ से मृत्यु की सम्भावना होती है ...वायु राशी में होने से मस्तिष्क विकृति मृत्यु का कारण बनती है ...यदि मंगल वृषभ, कन्या और मकर राशी में हो तो शुभ फल मिलते हैं मकर राशी में मंगल संतान का आभाव करा ता है अथवा पुत्री संतान ज्यादा होती हैं ...ऐसा जाता ज्यादा खाने वाला ,,,मिष्ठान्न प्रिय होता है फलत: अजीर्ण रोग से पीड़ित रहता है ...ऐसा जातक राजकीय कर्मचारी हो तो खूब रिश्वत लेता है...यदि कर्क, वृश्चिक, एवं मीन राशी में मगल हो तो जातक के जल में डूबने से मृत्यु होने की सम्भावना रहती है....मेने पहले भी कहा की अष्टमस्थ मंगल बाधा कर्क होता है...जो व्यव्हार में गुस्सा, अहंकार, उत्तेजना ला कर इन्सान का पतन करता है...अत: समय रहते मंगल के जाप इत्यादि से उसके कोप को शांत किया जा सकता है...!!शिव ॐ !!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:..अष्टमस्थ बुध फलम..................
यदि बुध अष्टमस्थ हो तो जातक अतिथि सेवक होता है उस पर राज्य की कृपा बनी रहती है...तथा वह राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है...यहाँ ज्योतिष का एक बहुत सुंदर सूत्र..ये है की अकेले बुध.की दृष्टि धन भाव पर हो ..और बुध शुभ प्रभाव व शुभ राशी में हो तो जातक को अत्यंत धनी बनाता है ....वह प्रख्यात होता है ऐसा जातक अपने कुल का पालन करने वाला कुल श्रेष्ठ होता है उसकी स्मरण शक्ति अच्छी होती है तथा वह गुप्त विद्याओं और आध्यात्म शास्त्र के पठन-पाठन में रूचि होने से अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लेता है....ऐसा जातक मनमौजी दिल का साफ...चल कपट से दूर होता है अत: साझेदारी उसके लिए घातक होती है...यदि बुध उच्चस्थ और शुभ प्रभाव में हो तो अकस्मात् धन लाभ के उसे जीवन में कई सुअवसर मिलते हैं...ऐसा जातक सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय होता है तथा शुभ स्थिति में उसकी मृत्यु होती है.....सुंदर व्यक्तित्व का धनी ऐसा जातक शत्रु हन्ता होता है...आप्तजनो में विश्वास व्यक्त करते हुए अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर लेता है शास्त्रीय ज्ञान में रूचि होने से प्रख्यात देवज्ञ भी हो सकता है यदि बुध स्त्री राशी में हो तो मृत्यु का कारण मस्तिष्क विकार होता है ..बाल्यावस्था में सर में चोट लगती है ...यदि बुध पापा प्रभाव में आया हो तो जातक कुमार अवस्था से ही उसका चल चलन बिगड़ता है और अत्यधिक स्त्री प्रसंग के कारण विभिन्न रोगों से उसकी मृत्यु होती है ..शिव ॐ !!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ शुक्र फलम...........
यदि अष्टम भाव में शुक्र होतो अनायास धन की प्राप्ति होती है ...यहाँ अनायास धन प्राप्ति बिना अर्जन किये धन का द्योतक है ...ऐसे जातको को लोटरी , सट्टा, विरासत अथवा भूमि में गड़ा हुआ धन प्राप्त होता है विशेषत: किसी विधवा स्त्री की संपत्ति उसके मृत्यु के पश्चात प्राप्त हो जाती है ...अष्टम भाव आयु का स्थान है और नैसर्गिक रूप से शुक्र शुभ गृह है ...अत: जातक का दीर्घायु हो जाना स्वाभाविक है ...शुक्र के होने से आर्थिक और स्त्री विषेयक सुख और मिल जाता है ...ऐसा जातक विद्वान होता है तथा उसकी पत्नी प्राय: स्वाभिमानी, कर्ण प्रियभाषिणी,अवं विश्वासपात्र होती है...ऐसे जातक को प्राय: नशे की लत होती है...यदि शुक्र वृषभ, धनु या कर्क राशी में हो तो दाम्पत्य जीवन नरक तुली रहता है ...स्त्री एवं संतति से वैमनस्य बना रहता है...चूँकि ऐसे जातक अत्यधिक कामुक होने से व्यभिचारी प्रवृत्ति वाले होते हैं, फलत: मधुमेह , शुक्रमेह, उपदंश आदि गुप्त रोगों से ट्रस्ट हो कर दुःख भोगते हैं...
यदि शुक्र मिथुन या वृश्चिक राशी में अष्टमस्थ हो तो स्त्री सुख में न्यूनता रहती है...आर्थिक स्थिति साधारण तथा कार्य-व्यवसाय ठीक प्रकार नहीं चलता..यदि शुक्र मकर या कुम्भ राशी में हो तो जातक को संतान, स्त्री आदि का सुख अल्प होता है लेकिन परे स्त्रियों से उसके सम्बन्ध बने रहते हैं तथा उनसे उसे लाभ भी मिलता है ...यदि शुक्र कन्या व मेष राशी में हो तो विवाहोपरांत जातक अवनति के गर्त में गिर जाता है...कार्य-व्यवसाय में हानि, नौकरी में पदावनति , सस्पेंसन आदि फल मिलते हैं..ऐसा जातक प्राय: ऋण ग्रस्त रहता है .....अन्य राशियों में प्राय: सब ठीक ठाक रहता है..ऐसा जातक परित्यक्ता तथा विधवा स्त्रियों से सम्बन्ध रखता है ...अष्टमस्थ शुक्र दूषित हो कर पाप प्रभाव में आया हो तो कामुकता यहाँ तक बढ़ जाती है की जातक कामवासना की शांति के लिए अनैतिक तथा अनैसर्गिक संसर्ग भी करता है .....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ शनि गृह फलम
यदि शनि अष्टमस्थ हो तो सुख की आशा करना निर्मूल है...शनि को ज्योतिष में दुःख का कारक तथा अष्टम स्थान को संकट, कष्ट, व मृत्यु आदि का स्थान माना जाता है ....अत: दुःख स्वरुप शनि जब स्वयं दुःख स्थान में विराजमान हो तो सुख की आशा करना निर्मूल है...इतने पर भी यदि शनि बलवान हो तो जातक दीर्घायु होता है ...पूर्णायु भोग कर ही ऐसा जातक स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त होता है यदि शनि स्वग्रही अथवा उच्च का हो तो जातक को दहेज़ में अच्छा धन और संपत्ति प्राप्त होती है ...ऐसा जातक मृत्यु समय स्वस्थ चित्त रहता है तथा मृत्यु का उसे पूर्वाभास होता है...उसे ज्ञान होता है...
अत्यधिक पाप प्रभाव में आया शनि राजकीय दंड विशेषत: कारावास का कारन बनता है ऐसे जातक की बाल्यावस्था में ही उसके माता-पिता की मृत्यु हो जाती है या पिता को भारी आर्थिक हानि होती है...यदि शनि कर्क राशी में हो तो जातक संपत्ति और अधिकार दोनों मिल जाते हैं ...यदि शनि धनु राशी में हो तो विवाहोपरांत अशुभ फल करता है ...इसका कारण भाग्येश का अपनी राशी से द्वादश होना है (वृषभ लग्न में शनि भाग्येश होते हैं और जब वे अष्टम भाव में हो तो भाग्य भाव से द्वादश स्थान अष्टम पड़ता है)..ऐसे जातक को धनार्जन नहीं हो पता बल्कि उसके व्यय में वृद्धि हो जाती है...यदि शनि वृषभ, कन्या, तुला और कुम्भ या मीन राशी में हो तो नौकरी के लिए शुभ होता है शेष राशियों में हो तो स्वतंत्र व्यवसाय के लिए शुभ होता है ...लेकिन संतान और संपत्ति दोनों एक साथ नहीं मिलते.....क्रमश: शेष कल...२३/१०/२०१२
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ राहु फलम............
राहु एक छाया गृह है इसका अपना कोई फल नहीं होता है ..यह जिस राशी में स्थित होता है तदनुसार फल देता है ...इतने पर भी इसमें शनि जैसे गुण होते हैं..."शनिवत राहु कुज वत केतु " अर्थात राहु का फल शनि जैसा और केतु का फल मंगल जैसा ! राहु और शनि के पापत्व में बड़ा अंतर है... शनि जातक को विभिन्न कष्ट देकर धर्म अध्यात्म की और परिवर्तन करते हैं वाही राहु...अपनी राशी स्थिति अनुसार विभिन्न बाधाएं, आकस्मिक शुभाशुभ प्रभाव अथवा विनाश जैसे भूकंप, तूफान.या कोई भयानक प्राकर्तिक आपदा, शक्तिशाली से शक्तिशाली सत्ता] व्यक्ति को धूल चटा देते हैं ...रहू कालपुरुष का मुख है ..समस्त श्रृष्टि , समस्त चराचर जगत कल पुरुष के मुख में समां जाता है...पापी श्रेणी में इसी वजह से गिना जाता है की अस्तित्व न होते हुए भी ...महाकाल है...अत: विनाशक हैं ..जब देने पर आते हैं तो रंक को रजा बनते देर नहीं लगती....यदि राहु पुरुष राशी में से किसी में हो तो दाम्पत्य जीवन नरक तुल्य होता है ...क्यूंकि स्त्री कलह करने वाली व संदिग्ध चरित्र की होती है .ऐसे जातक को धनार्जन की धुन रहती है...वहा नैतिक-अनैतिक का ध्यान किये बिना धन संचय में लगा रहता है ...राजकीय नौकरी में हो तो रिश्वत लेता है पर शीघ्र ही पकड़ा जाता है और दंड भोगता है ....इसकी मृत्यु मूर्छित अवस्था में होती है
स्त्री राशी का राहु हो तो प्राय: उपरोक्त से फल उलटे मिलते हैं...पत्नी अच्छी मिलती है....लेकिन पत्नी की मृत्यु हो जाने से विधुर जीवन यापन करना पड़ता है...इसे मृत्यु का ज्ञान पहले ही हो जाता है तथा मृत्यु के समय चेतना बनी रहती है...प्राय: ऐसे जातक स्वतंत्र व्यवसाय करते हैं..यदि नौकरी करते हो तो रिश्वत लेते हैं पर पकडे नहीं जाते ..यदि राहु शुभ प्रभाव में हो तो जातक को उत्तर आयु में सुख मिलता है..लेकिन पापा प्रभाव में हो तो बुढ़ापे तक सुख नहीं मिलता ...अत: अष्टमस्थ गृह को ध्यान में रख कर उसकी शांति ...अवश्य करा लेनी चाहिए...
अष्टमस्थ केतु
अष्टमस्थ केतु शुभ फलदाता नहीं होता ...ऐसे जातक को प्राय: अर्श, भगंदर, आदि रोग लगे रहते हैं मूत्रकृछ (यूरिन की बीमारी, इस'कक्क की बीमारी )से वह ४२ वर्ष की उम्र में पीड़ित होता है ...व्यवसाय में अनेक उलझाने आती हैं ...जातक जितनी महनत करता है उतना उसको फल नहीं मिलता...दिया हुआ पैसा वापस नहीं आता..प्राय: वृश्चिक राशी का केतु शुभ फल देता है..जैसा की पहले बताया ..की इसका फल मंगल जैसा होता है ...फोड़े, फुंसी , मुहासे, आगजनी की घटना, विस्फोट, ये सब केतु के लक्षण हैं...जातक को दुर्घटनाओं से देह कष्ट होता है...पत्नी बच्चों में कलह बनी रहती है ...शत्रु के शास्त्र से मृत्यु की आशंका रहती है ...यदि केतु शुभ प्रभाव में हो तो उपर्युक्त फलो में न्यूनता रहती है ...और शुभ फल मिलते हैं.....शिव ॐ...
अष्टम भाव में किसी भी क्रूर और पापी ग्रहों की स्थिति शुभ नहीं मानी गई है ...जातक को अपने जीवन में मृत्यु तुल्य कष्टों अवरोधों की स्थिति का सामना करना पड सकता है ...प्राचीन ग्रंथकारों ने अष्टमस्थ सूर्य के अशुभ फल ही बताएं हैं....लेकिन अनुभव में शुभाशुभ दोनों प्रकार के फलों को देखा गया है...यदि सूर्य पुरुष राशी...मुख्यतया अग्नि राशियों में हो तो बुरे फल मिलते हैं...घर की गुप्त बातें, जिनका दूसरों को ज्ञान हो जाना अहितकर होता है घर से बहार चली जाती हैं...नौकर-चाकर विश्वस्त नहीं होते ...यहाँ तक की अपनी पत्नी भी विश्वासपात्र नहीं रहती ...ऐसे में पारी या पत्नी कोई विश्वासघात करे तो क्या आश्चर्य ..यदि सूर्य स्व-राशी अथवा उच्च का हो तो असावधानीवश जातक की मृत्यु होती है ...यदि सूर्य वृश्चिक, मकर, कुम्भ, तुला, वृषभ या कन्या राशी में हो तो जातक को लम्बी बीमारियाँ भोग कर मृत्यु का आलिंगन करना पड़ता है ...उसके जीवन साथी का चरित्र संदिग्ध रहता है...तथा मृत्यु भी जीवन साथी से पहले हो जाती है...जीवन के अंतिम दिनों में जातक को अर्थाभाव झेलना पड़ता है ..यह सब ऐसे ही होता है जैसे सूर्यास्त के बाद का अँधेरा ...सूर्य के स्त्री राशी में रहने से संतति सुख अधिक मिलता है ..पुरुष राशी में संतान सुख अल्प होता है दृष्टि मंदता से परेशानी होती ...ज्यादा पापा प्रभव में सूर्य हो तो आँख का ओप्रेसन भी होता है ...अधिक स्त्री प्रसंग के कारण उसे गुप्त रोगों का शिकार होना पड़ता है!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ भावस्थ चन्द्रमा.....
यदि अष्टमस्थ चन्द्र हो तो बचपन में अरिष्ट होता है ...कई प्रकार के रोगों से जातक ग्रस्त रहता है...अनेक चिकित्सकों से निदान करने पर भी व्याधियां उसका पीछा नहीं छोडती उसे जल में डूबने का भय रहता है...अथवा जलोदर रोग उसकी मृत्यु का कारन बनता है यह प्राय: बाल्यकाल में ही घटित हो जाता है क्यूंकि अरिष्ट्प्रद चंद्रमा बच्चों के लिए ही ज्यादा कष्टदायी रहता है......यदि अग्नि राशी का चंद्रमा हो तो येन-केन-प्रकारेण जातक को धन मिल जाता है...विवाह में भी अच्छा दान -दहेज़ मिल जाता है...या किसी के द्वारा वारिस घोषित होने से धन-संपत्ति मिल जाती है ..यदि चन्द्र वायु राशी में हो तो जीवन साथी अच्चा मिलता है...लेकिन परिवार में कलह बनी रहती है....ऐसा जातक योगाभ्यासी , वेदांत को जानने वाला व इश्वर की उपासना करने वाल होता है उसके घर की गुप्त बातें दूसरों को नौकरों के द्वारा अथवा पत्नी के द्वारा ज्ञात हो जाती हैं ४५ वे वर्ष से सम्पत्तिनाशक योग बनते हैं....लेकिन यदि चंद्रमा उच्च या स्वग्रही हो तो शुभ फल मिलते हैं....
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ मंगल फलम
यदि अष्टम भाव में मंगल हो तो जातक प्राय: रोगों से ग्रस्त रहता है ! उसे देहसुख अच्छा नहीं मिलता तथा वह अल्पायु एवं दरिद्री अथवा अभावग्रस्त रहता है.. जातक की बोलचाल बहुत रुखी..और असभ्य होती है...ऐसा जातक स्वार्थी और कंजूस भी होता है शायद जीवन की कठिनाई उसे ऐसा करने पर विवास करती हो ...अनभव में आय अ है की ऐसे जातक का मध्य कल निर्धनावस्था में व्यतीत होता है प्राचीन महाऋषियों ने कहा है की अष्टम में अगर मंगल विराजमान हो तो उसके लिए शुभ स्थानों में बैठे शुभ गृह भी लाभ नहीं देते...विवाह से लाभ नहीं होता ..उलटे परेशानियाँ बढती है ...मित्र शत्रुवत व्यव्हार करते हैं यदि मंगल नीच राशी में हो तो रक्त-पित्त हो जाता है ...सूर्य चंद्रमा और शनि के साथ यदि मंगल भी अशुभ सम्बन्ध में हो तो जातक अल्पायु होता है अथवा किसी षट्कर्म के कारण उसकी मृत्यु होती है...यदि अकेला मंगल हो तो शीघ्र मृत्यु नहीं होने देता...
यदि मंगल अग्नि राशी में हो तो जातक की आग से जल कर मृत्यु होती है अथवा किसी गोली या विस्फोटक पदार्थ से मृत्यु की सम्भावना होती है ...वायु राशी में होने से मस्तिष्क विकृति मृत्यु का कारण बनती है ...यदि मंगल वृषभ, कन्या और मकर राशी में हो तो शुभ फल मिलते हैं मकर राशी में मंगल संतान का आभाव करा ता है अथवा पुत्री संतान ज्यादा होती हैं ...ऐसा जाता ज्यादा खाने वाला ,,,मिष्ठान्न प्रिय होता है फलत: अजीर्ण रोग से पीड़ित रहता है ...ऐसा जातक राजकीय कर्मचारी हो तो खूब रिश्वत लेता है...यदि कर्क, वृश्चिक, एवं मीन राशी में मगल हो तो जातक के जल में डूबने से मृत्यु होने की सम्भावना रहती है....मेने पहले भी कहा की अष्टमस्थ मंगल बाधा कर्क होता है...जो व्यव्हार में गुस्सा, अहंकार, उत्तेजना ला कर इन्सान का पतन करता है...अत: समय रहते मंगल के जाप इत्यादि से उसके कोप को शांत किया जा सकता है...!!शिव ॐ !!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:..अष्टमस्थ बुध फलम..................
यदि बुध अष्टमस्थ हो तो जातक अतिथि सेवक होता है उस पर राज्य की कृपा बनी रहती है...तथा वह राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है...यहाँ ज्योतिष का एक बहुत सुंदर सूत्र..ये है की अकेले बुध.की दृष्टि धन भाव पर हो ..और बुध शुभ प्रभाव व शुभ राशी में हो तो जातक को अत्यंत धनी बनाता है ....वह प्रख्यात होता है ऐसा जातक अपने कुल का पालन करने वाला कुल श्रेष्ठ होता है उसकी स्मरण शक्ति अच्छी होती है तथा वह गुप्त विद्याओं और आध्यात्म शास्त्र के पठन-पाठन में रूचि होने से अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लेता है....ऐसा जातक मनमौजी दिल का साफ...चल कपट से दूर होता है अत: साझेदारी उसके लिए घातक होती है...यदि बुध उच्चस्थ और शुभ प्रभाव में हो तो अकस्मात् धन लाभ के उसे जीवन में कई सुअवसर मिलते हैं...ऐसा जातक सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय होता है तथा शुभ स्थिति में उसकी मृत्यु होती है.....सुंदर व्यक्तित्व का धनी ऐसा जातक शत्रु हन्ता होता है...आप्तजनो में विश्वास व्यक्त करते हुए अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर लेता है शास्त्रीय ज्ञान में रूचि होने से प्रख्यात देवज्ञ भी हो सकता है यदि बुध स्त्री राशी में हो तो मृत्यु का कारण मस्तिष्क विकार होता है ..बाल्यावस्था में सर में चोट लगती है ...यदि बुध पापा प्रभाव में आया हो तो जातक कुमार अवस्था से ही उसका चल चलन बिगड़ता है और अत्यधिक स्त्री प्रसंग के कारण विभिन्न रोगों से उसकी मृत्यु होती है ..शिव ॐ !!
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ शुक्र फलम...........
यदि अष्टम भाव में शुक्र होतो अनायास धन की प्राप्ति होती है ...यहाँ अनायास धन प्राप्ति बिना अर्जन किये धन का द्योतक है ...ऐसे जातको को लोटरी , सट्टा, विरासत अथवा भूमि में गड़ा हुआ धन प्राप्त होता है विशेषत: किसी विधवा स्त्री की संपत्ति उसके मृत्यु के पश्चात प्राप्त हो जाती है ...अष्टम भाव आयु का स्थान है और नैसर्गिक रूप से शुक्र शुभ गृह है ...अत: जातक का दीर्घायु हो जाना स्वाभाविक है ...शुक्र के होने से आर्थिक और स्त्री विषेयक सुख और मिल जाता है ...ऐसा जातक विद्वान होता है तथा उसकी पत्नी प्राय: स्वाभिमानी, कर्ण प्रियभाषिणी,अवं विश्वासपात्र होती है...ऐसे जातक को प्राय: नशे की लत होती है...यदि शुक्र वृषभ, धनु या कर्क राशी में हो तो दाम्पत्य जीवन नरक तुली रहता है ...स्त्री एवं संतति से वैमनस्य बना रहता है...चूँकि ऐसे जातक अत्यधिक कामुक होने से व्यभिचारी प्रवृत्ति वाले होते हैं, फलत: मधुमेह , शुक्रमेह, उपदंश आदि गुप्त रोगों से ट्रस्ट हो कर दुःख भोगते हैं...
यदि शुक्र मिथुन या वृश्चिक राशी में अष्टमस्थ हो तो स्त्री सुख में न्यूनता रहती है...आर्थिक स्थिति साधारण तथा कार्य-व्यवसाय ठीक प्रकार नहीं चलता..यदि शुक्र मकर या कुम्भ राशी में हो तो जातक को संतान, स्त्री आदि का सुख अल्प होता है लेकिन परे स्त्रियों से उसके सम्बन्ध बने रहते हैं तथा उनसे उसे लाभ भी मिलता है ...यदि शुक्र कन्या व मेष राशी में हो तो विवाहोपरांत जातक अवनति के गर्त में गिर जाता है...कार्य-व्यवसाय में हानि, नौकरी में पदावनति , सस्पेंसन आदि फल मिलते हैं..ऐसा जातक प्राय: ऋण ग्रस्त रहता है .....अन्य राशियों में प्राय: सब ठीक ठाक रहता है..ऐसा जातक परित्यक्ता तथा विधवा स्त्रियों से सम्बन्ध रखता है ...अष्टमस्थ शुक्र दूषित हो कर पाप प्रभाव में आया हो तो कामुकता यहाँ तक बढ़ जाती है की जातक कामवासना की शांति के लिए अनैतिक तथा अनैसर्गिक संसर्ग भी करता है .....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ शनि गृह फलम
यदि शनि अष्टमस्थ हो तो सुख की आशा करना निर्मूल है...शनि को ज्योतिष में दुःख का कारक तथा अष्टम स्थान को संकट, कष्ट, व मृत्यु आदि का स्थान माना जाता है ....अत: दुःख स्वरुप शनि जब स्वयं दुःख स्थान में विराजमान हो तो सुख की आशा करना निर्मूल है...इतने पर भी यदि शनि बलवान हो तो जातक दीर्घायु होता है ...पूर्णायु भोग कर ही ऐसा जातक स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त होता है यदि शनि स्वग्रही अथवा उच्च का हो तो जातक को दहेज़ में अच्छा धन और संपत्ति प्राप्त होती है ...ऐसा जातक मृत्यु समय स्वस्थ चित्त रहता है तथा मृत्यु का उसे पूर्वाभास होता है...उसे ज्ञान होता है...
अत्यधिक पाप प्रभाव में आया शनि राजकीय दंड विशेषत: कारावास का कारन बनता है ऐसे जातक की बाल्यावस्था में ही उसके माता-पिता की मृत्यु हो जाती है या पिता को भारी आर्थिक हानि होती है...यदि शनि कर्क राशी में हो तो जातक संपत्ति और अधिकार दोनों मिल जाते हैं ...यदि शनि धनु राशी में हो तो विवाहोपरांत अशुभ फल करता है ...इसका कारण भाग्येश का अपनी राशी से द्वादश होना है (वृषभ लग्न में शनि भाग्येश होते हैं और जब वे अष्टम भाव में हो तो भाग्य भाव से द्वादश स्थान अष्टम पड़ता है)..ऐसे जातक को धनार्जन नहीं हो पता बल्कि उसके व्यय में वृद्धि हो जाती है...यदि शनि वृषभ, कन्या, तुला और कुम्भ या मीन राशी में हो तो नौकरी के लिए शुभ होता है शेष राशियों में हो तो स्वतंत्र व्यवसाय के लिए शुभ होता है ...लेकिन संतान और संपत्ति दोनों एक साथ नहीं मिलते.....क्रमश: शेष कल...२३/१०/२०१२
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ राहु फलम............
राहु एक छाया गृह है इसका अपना कोई फल नहीं होता है ..यह जिस राशी में स्थित होता है तदनुसार फल देता है ...इतने पर भी इसमें शनि जैसे गुण होते हैं..."शनिवत राहु कुज वत केतु " अर्थात राहु का फल शनि जैसा और केतु का फल मंगल जैसा ! राहु और शनि के पापत्व में बड़ा अंतर है... शनि जातक को विभिन्न कष्ट देकर धर्म अध्यात्म की और परिवर्तन करते हैं वाही राहु...अपनी राशी स्थिति अनुसार विभिन्न बाधाएं, आकस्मिक शुभाशुभ प्रभाव अथवा विनाश जैसे भूकंप, तूफान.या कोई भयानक प्राकर्तिक आपदा, शक्तिशाली से शक्तिशाली सत्ता] व्यक्ति को धूल चटा देते हैं ...रहू कालपुरुष का मुख है ..समस्त श्रृष्टि , समस्त चराचर जगत कल पुरुष के मुख में समां जाता है...पापी श्रेणी में इसी वजह से गिना जाता है की अस्तित्व न होते हुए भी ...महाकाल है...अत: विनाशक हैं ..जब देने पर आते हैं तो रंक को रजा बनते देर नहीं लगती....यदि राहु पुरुष राशी में से किसी में हो तो दाम्पत्य जीवन नरक तुल्य होता है ...क्यूंकि स्त्री कलह करने वाली व संदिग्ध चरित्र की होती है .ऐसे जातक को धनार्जन की धुन रहती है...वहा नैतिक-अनैतिक का ध्यान किये बिना धन संचय में लगा रहता है ...राजकीय नौकरी में हो तो रिश्वत लेता है पर शीघ्र ही पकड़ा जाता है और दंड भोगता है ....इसकी मृत्यु मूर्छित अवस्था में होती है
स्त्री राशी का राहु हो तो प्राय: उपरोक्त से फल उलटे मिलते हैं...पत्नी अच्छी मिलती है....लेकिन पत्नी की मृत्यु हो जाने से विधुर जीवन यापन करना पड़ता है...इसे मृत्यु का ज्ञान पहले ही हो जाता है तथा मृत्यु के समय चेतना बनी रहती है...प्राय: ऐसे जातक स्वतंत्र व्यवसाय करते हैं..यदि नौकरी करते हो तो रिश्वत लेते हैं पर पकडे नहीं जाते ..यदि राहु शुभ प्रभाव में हो तो जातक को उत्तर आयु में सुख मिलता है..लेकिन पापा प्रभाव में हो तो बुढ़ापे तक सुख नहीं मिलता ...अत: अष्टमस्थ गृह को ध्यान में रख कर उसकी शांति ...अवश्य करा लेनी चाहिए...
अष्टमस्थ केतु
अष्टमस्थ केतु शुभ फलदाता नहीं होता ...ऐसे जातक को प्राय: अर्श, भगंदर, आदि रोग लगे रहते हैं मूत्रकृछ (यूरिन की बीमारी, इस'कक्क की बीमारी )से वह ४२ वर्ष की उम्र में पीड़ित होता है ...व्यवसाय में अनेक उलझाने आती हैं ...जातक जितनी महनत करता है उतना उसको फल नहीं मिलता...दिया हुआ पैसा वापस नहीं आता..प्राय: वृश्चिक राशी का केतु शुभ फल देता है..जैसा की पहले बताया ..की इसका फल मंगल जैसा होता है ...फोड़े, फुंसी , मुहासे, आगजनी की घटना, विस्फोट, ये सब केतु के लक्षण हैं...जातक को दुर्घटनाओं से देह कष्ट होता है...पत्नी बच्चों में कलह बनी रहती है ...शत्रु के शास्त्र से मृत्यु की आशंका रहती है ...यदि केतु शुभ प्रभाव में हो तो उपर्युक्त फलो में न्यूनता रहती है ...और शुभ फल मिलते हैं.....शिव ॐ...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:अथ अष्टम भाव फलं ....
कुंडली में अष्टम भाव का बहुत महत्त्व है ..यह जातक की आयु का परिचय देता.है इस भाव में स्थित गृह का, दृष्टि का बहुत महत्त्व है इस भाव में स्थित गृह आपके सम्पूर्ण व्यक्तिव को शुभाशुभ प्रभाव प्रदान करते हैं....यदि जीवन है तो कुंडली के एनी भावो के योगो का भी कोई अर्थ है अन्यथा नहीं... अत: कुंडली में मारक योग का निर्णय करने के लिए सप्तमेश और द्वितीयेश का भी विचार कर लेना चाहिए क्यूँ की आठवां और तीसरा भाव (अष्टम से अष्टम ) आयु स्थान कहे गए हैं और द्वितीय तीसरे भाव का व्ययेश होने के कारन भी आयु का सूचक है....जातक की आयु कितनी होगी यह ज्ञात करने के लिए लग्न, लग्नेश, अष्टम, अष्टम भाव, तृतीय भाव तथा तृतीयेश तथा परम अयुश्कार्क शनि देव के बल का सम्यक अध्यन बहुत जरुरी है ....
यदि इनमे से दो भाव बलवान हो तो जातक अल्पायु, तीन भाव बलवान हो तो मध्यमायु और चारो बलवान हो तो पूर्णायु होता है ...इसके अलावा चंद्रमा और बुद्ध की स्थिति पर भी विचार कर लेना आवश्यक है क्यूंकि कुंडली में इनकी हीन बलवता बचपन में अरिष्ट्प्रद होती है ...जातक की मृत्यु तक हो जाती है..भगवान शिव ने ज्योतिष के २,५०,००० सूत्र प्रतिपादित किये थे जो कालांतर में घटते -घटते मात्र ५२०० रह गए जिनमे से अकेले २५०० सूत्र नाड़ी सूत्र हैं जो अपने आपमें बहुत सटीक भविष्यफल कहने में समर्थ हैं और दक्षिण भारत में वहां के विद्वजनो के पास सुरक्षित हैं...उन्होंने इन्हें कभी प्रकाशित नहीं किया...गोपनीय रखा हुआ है...इस भाव से मुख्यता आयु की अवधि व मृत्यु कब और कैसे होगी, विदेश यात्रा योग, स्त्री सौम्य या कर्कशा , विपरीत राजयोग से प्रचुर धन और गहन चिंतन अथवा अन्वेषण के साथ , गुप्त धन, गुह्य अंगो में रोग..इत्यादि का अध्यन किया जाता है...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ विभिन्न राशी फल
अष्टमस्थ मेष राशी फल : स्वामी मंगल
यदि अष्टम स्थान में मेष राशी हो तो जातक प्राय: बहार विदेश में ही निवास करता है...यहाँ मंगल तीसरे और आठवे दोनों आयु भावों का अधिपति बनता है ...अत: यदि लग्न बलवान हो तो आयु दीर्घ होती है ...अष्टम भाव और अष्टमेश दोनों मंगल पर पड़ने वाले प्रभाव को मृत्यु का कारन बतलाते हैं...मंगल यदि अष्टम भाव में हो तो जातक यौवनकल में व्यसनी होता है...उसे नींद में बद्बदाने की अथवा उठकर चलने का योग होता हैशुभ योग हो तो जातक धनि-मानी होता है ऐसे जातक की मृत्यु भी घर में नहीं होती ...विदेशवास के दौरान ही ऐसा जातक पूर्व बातों को याद करता हुआ प्राणों को त्यागता है ...यदि अशुभ योग हो तो जातक दरिद्र व हर समय चिंता करने वाल होता है ..अष्टम भाव में पापा गृह बाधक तो होते हैं वहीँ प्रतिस्पर्धा अथवा सार्वजानिक चुनावो के लिए अच्छे भी होते हैं...
अष्टमस्थ वृषभ राशी फल....स्वामी शुक्र
यदि अष्टम भाव में वृषभ राशी हो तो शुक्र लग्नाधिपति और अष्टमेश बनता है....इसकी निर्बल स्थिति जातक की आयु को समाप्त कर देती है ऐसे जातक को काफ रोग होता है और प्राय: काफ के कारन ही श्वास नलिका में अवरोध होने से उसकी मृत्यु हो जाती है ऐसे जातक को प्राय: भोजन करते समय..अचानक धसका सा लग जाता है ..ऐसे जातक को सावधानी रखनी चाहिए की...और पानी का सेवन करते रहना चाहिए.... यदि चन्द्र और बुध के साथ शुक्र भी बलि हो तो अत्यधिक ख़ुशी या हंसने के कारन जातक की ह्रदय गति रुक जाती है ऐसा जातक चोरो अथवा डाकुओं से संघर्ष करता हुआ मृत्यु को प्राप्त होता है चोपयों के सींगो से भी मृत्यु भय होता है यदि लग्न और शुक्र मंगल या केतु से प्रभावित हो तो जातक की मृत्यु अग्निदाह अथवा विस्फोटक, या गोली लगने से होती है ....
ॐ श्री गणेशाम्बा गुर्भ्यो नम:
अष्टमस्थ मिथुन राशी....स्वामी बुध
यदि अष्टमस्थ मिथुन राशी हो तो बुध अष्टमेश बनता है...बुध सौर मंडल वहां की गृह परिषद् में युवराज का स्थान प्राप्त है...गति तेज़ है..२०-४२ दिनों में एक राशी में रहते हैं..अत: अतिशीघ्र शुभाशुभ फल प्रदाता माने जाते हैं..अत: बाल्यावस्था से ही शुभाशुभ प्रभाव घटित होने प्रारंभ हो जाते हैं ...पाप प्रभाव में आया बुध जातक को शीघ्र ही घर से विलग कर देता है और वह विदेशवास करता है...यदि मंगल की राशी में स्थित हो कर बुध पाप प्रभाव में हो, पाप दृष्ट हो अथवा किसी भी शुभ गृह की दृष्टि में न हो तो दीर्घकालीन रोगों से ग्रसित करता है ..लेकिन धन लाभ के लिए ऐसा बुध अच्छा होता है यदि बुध वृश्चिक राशी में हो तो जातक शत्रुओं द्वारा घात लगाकर मारा जाता है ...ऐसा जातक पापात्मा होता है फलत: पापों के परिणामस्वरूप मृत्यु का ग्रास बनता है......अर्श, भगंदर जैसे गुदा रोग भी मृत्यु का कारन बनते हैं लम्पट होने से प्रमेह या मधुमेह जैसे रोग हो जाने से भी आयु क्षीण. होती है ....
अष्टमस्थ कर्क राशी....स्वामी चन्द्र
यदि अष्टमस्थ कर्क राशी हो तो चन्द्रमा अष्टमधिपति होता है इस पर आया पाप प्रभाव अरिष्ट्प्रद रहता है...शैशवकाल में ऐसा जातक अनेक कष्ट भोगता है ..उसे जल में डूबने का भय होता है अत: ऐसे जातक को जल से सावधान रहना चाहिए ...अथवा कालांतर में जलोदर नमक रोग से मृत्यु संभव होती है ...ऐसे जातकों की नौकरों के द्वारा या घर की किसी स्त्री के द्वारा घर की गुप्ता बातें घर से बहार जाती हैं ..यदि चन्द्रमा यहाँ उच्च का हो शुभ प्रभाव में हो और पंचम भाव भी शुभ प्रभाव में हो तो जातक को आकस्मिक लाभ, अद्भुत दैविक ज्ञान प्राप्त होता है .....
कुंडली में अष्टम भाव का बहुत महत्त्व है ..यह जातक की आयु का परिचय देता.है इस भाव में स्थित गृह का, दृष्टि का बहुत महत्त्व है इस भाव में स्थित गृह आपके सम्पूर्ण व्यक्तिव को शुभाशुभ प्रभाव प्रदान करते हैं....यदि जीवन है तो कुंडली के एनी भावो के योगो का भी कोई अर्थ है अन्यथा नहीं... अत: कुंडली में मारक योग का निर्णय करने के लिए सप्तमेश और द्वितीयेश का भी विचार कर लेना चाहिए क्यूँ की आठवां और तीसरा भाव (अष्टम से अष्टम ) आयु स्थान कहे गए हैं और द्वितीय तीसरे भाव का व्ययेश होने के कारन भी आयु का सूचक है....जातक की आयु कितनी होगी यह ज्ञात करने के लिए लग्न, लग्नेश, अष्टम, अष्टम भाव, तृतीय भाव तथा तृतीयेश तथा परम अयुश्कार्क शनि देव के बल का सम्यक अध्यन बहुत जरुरी है ....
यदि इनमे से दो भाव बलवान हो तो जातक अल्पायु, तीन भाव बलवान हो तो मध्यमायु और चारो बलवान हो तो पूर्णायु होता है ...इसके अलावा चंद्रमा और बुद्ध की स्थिति पर भी विचार कर लेना आवश्यक है क्यूंकि कुंडली में इनकी हीन बलवता बचपन में अरिष्ट्प्रद होती है ...जातक की मृत्यु तक हो जाती है..भगवान शिव ने ज्योतिष के २,५०,००० सूत्र प्रतिपादित किये थे जो कालांतर में घटते -घटते मात्र ५२०० रह गए जिनमे से अकेले २५०० सूत्र नाड़ी सूत्र हैं जो अपने आपमें बहुत सटीक भविष्यफल कहने में समर्थ हैं और दक्षिण भारत में वहां के विद्वजनो के पास सुरक्षित हैं...उन्होंने इन्हें कभी प्रकाशित नहीं किया...गोपनीय रखा हुआ है...इस भाव से मुख्यता आयु की अवधि व मृत्यु कब और कैसे होगी, विदेश यात्रा योग, स्त्री सौम्य या कर्कशा , विपरीत राजयोग से प्रचुर धन और गहन चिंतन अथवा अन्वेषण के साथ , गुप्त धन, गुह्य अंगो में रोग..इत्यादि का अध्यन किया जाता है...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ विभिन्न राशी फल
अष्टमस्थ मेष राशी फल : स्वामी मंगल
यदि अष्टम स्थान में मेष राशी हो तो जातक प्राय: बहार विदेश में ही निवास करता है...यहाँ मंगल तीसरे और आठवे दोनों आयु भावों का अधिपति बनता है ...अत: यदि लग्न बलवान हो तो आयु दीर्घ होती है ...अष्टम भाव और अष्टमेश दोनों मंगल पर पड़ने वाले प्रभाव को मृत्यु का कारन बतलाते हैं...मंगल यदि अष्टम भाव में हो तो जातक यौवनकल में व्यसनी होता है...उसे नींद में बद्बदाने की अथवा उठकर चलने का योग होता हैशुभ योग हो तो जातक धनि-मानी होता है ऐसे जातक की मृत्यु भी घर में नहीं होती ...विदेशवास के दौरान ही ऐसा जातक पूर्व बातों को याद करता हुआ प्राणों को त्यागता है ...यदि अशुभ योग हो तो जातक दरिद्र व हर समय चिंता करने वाल होता है ..अष्टम भाव में पापा गृह बाधक तो होते हैं वहीँ प्रतिस्पर्धा अथवा सार्वजानिक चुनावो के लिए अच्छे भी होते हैं...
अष्टमस्थ वृषभ राशी फल....स्वामी शुक्र
यदि अष्टम भाव में वृषभ राशी हो तो शुक्र लग्नाधिपति और अष्टमेश बनता है....इसकी निर्बल स्थिति जातक की आयु को समाप्त कर देती है ऐसे जातक को काफ रोग होता है और प्राय: काफ के कारन ही श्वास नलिका में अवरोध होने से उसकी मृत्यु हो जाती है ऐसे जातक को प्राय: भोजन करते समय..अचानक धसका सा लग जाता है ..ऐसे जातक को सावधानी रखनी चाहिए की...और पानी का सेवन करते रहना चाहिए.... यदि चन्द्र और बुध के साथ शुक्र भी बलि हो तो अत्यधिक ख़ुशी या हंसने के कारन जातक की ह्रदय गति रुक जाती है ऐसा जातक चोरो अथवा डाकुओं से संघर्ष करता हुआ मृत्यु को प्राप्त होता है चोपयों के सींगो से भी मृत्यु भय होता है यदि लग्न और शुक्र मंगल या केतु से प्रभावित हो तो जातक की मृत्यु अग्निदाह अथवा विस्फोटक, या गोली लगने से होती है ....
ॐ श्री गणेशाम्बा गुर्भ्यो नम:
अष्टमस्थ मिथुन राशी....स्वामी बुध
यदि अष्टमस्थ मिथुन राशी हो तो बुध अष्टमेश बनता है...बुध सौर मंडल वहां की गृह परिषद् में युवराज का स्थान प्राप्त है...गति तेज़ है..२०-४२ दिनों में एक राशी में रहते हैं..अत: अतिशीघ्र शुभाशुभ फल प्रदाता माने जाते हैं..अत: बाल्यावस्था से ही शुभाशुभ प्रभाव घटित होने प्रारंभ हो जाते हैं ...पाप प्रभाव में आया बुध जातक को शीघ्र ही घर से विलग कर देता है और वह विदेशवास करता है...यदि मंगल की राशी में स्थित हो कर बुध पाप प्रभाव में हो, पाप दृष्ट हो अथवा किसी भी शुभ गृह की दृष्टि में न हो तो दीर्घकालीन रोगों से ग्रसित करता है ..लेकिन धन लाभ के लिए ऐसा बुध अच्छा होता है यदि बुध वृश्चिक राशी में हो तो जातक शत्रुओं द्वारा घात लगाकर मारा जाता है ...ऐसा जातक पापात्मा होता है फलत: पापों के परिणामस्वरूप मृत्यु का ग्रास बनता है......अर्श, भगंदर जैसे गुदा रोग भी मृत्यु का कारन बनते हैं लम्पट होने से प्रमेह या मधुमेह जैसे रोग हो जाने से भी आयु क्षीण. होती है ....
अष्टमस्थ कर्क राशी....स्वामी चन्द्र
यदि अष्टमस्थ कर्क राशी हो तो चन्द्रमा अष्टमधिपति होता है इस पर आया पाप प्रभाव अरिष्ट्प्रद रहता है...शैशवकाल में ऐसा जातक अनेक कष्ट भोगता है ..उसे जल में डूबने का भय होता है अत: ऐसे जातक को जल से सावधान रहना चाहिए ...अथवा कालांतर में जलोदर नमक रोग से मृत्यु संभव होती है ...ऐसे जातकों की नौकरों के द्वारा या घर की किसी स्त्री के द्वारा घर की गुप्ता बातें घर से बहार जाती हैं ..यदि चन्द्रमा यहाँ उच्च का हो शुभ प्रभाव में हो और पंचम भाव भी शुभ प्रभाव में हो तो जातक को आकस्मिक लाभ, अद्भुत दैविक ज्ञान प्राप्त होता है .....
- !!ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:!!
अष्टमस्थ सिंह राशी...स्वामी सूर्य
यदि अष्टम भाव में सिंह राशी हो तो सूर्य अष्टमाधिपति बनता है यदि लग्न व लग्नेश पर इसका अशुभ प्रभाव हो तो जातक हकला कर बोलता है अर्थात उसकी वाणी में दोष होता है सर्प के काटने से अथवा किसी के द्वारा विष दिए जाने से उसकी मृत्यु हो सकती है....हिंसक पशुओं (शेर, चीता आदि ) से खाए जाने का भय भी बना रहता है चोरों द्वारा उसकी धन संपत्ति अवम जीवन को हानि पहुँचती है...जीवन साथी खर्चीला मिलता है....यदि अष्टमेश अग्नि राशी का हो तो प्राय: अशुभ फल ही अनुभव में आते हैं ऐसे जातक के जीवन साथी का चरित्र संदिग्ध रहता है तथा उसकी वृद्धावस्था कष्टकर व्यतीत होती है...विशेषत: अर्थाभाव बना रहता है ....
अष्टमस्थ कन्या राशी....स्वामी बुध
अष्टमस्थ कन्या राशी हो तो बुध त्रिकोणेश होने के साथ-साथ अष्टमाधिपति भी बनता है...यदि बुध निर्बल अवस्था का हो तो जातक को पुत्र द्वारा अपमान सहन करना पड़ता है...तथा धन की हानि होती है मृगी होने की सम्भावना रहती है यदि सूर्य पाप प्रभाव में हो तो जातक का विवाह नहीं होता मृत्यु सावधान अवस्था में होती है...यदि अष्टमाधिपति छटे भाव में हो तो सुजाक अथवा किसी गुप्त रोग से जातक की मृत्यु की सम्भावना होती है ...ऐसा जातक गुप्त विद्या और आध्यात्म की पुस्तकें पढने में रूचि लेता है...यदि बुध स्वराशी होतो आक्स्मत धन लाभ होता है तथा यदि उच्च का हो तो अप्रत्यासित धन (भूमि में गड़ा धन, लोटरी ) आदि की प्रबल सम्भावना होती है ...विवाह हो जाये तो जातक की पत्नी रहस्य को गुप्त रखने वाली तथा आनंद पूर्वक रहने वाली होती है - October 14, 2012
- Devel Dublishशुभ प्रभात
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ तुला राशी ....स्वामी शुक्र...
अष्टमस्थ तुला राशी होने से शुक्र तृतीयेश अवं सप्तमेश बनकर प्रबल पापी गृह बन जाता है चूँकि ये दोनों ही आयु स्थान हैं और शुक्र आयुष्कारक गृह है फलत: शुक्र बलवान हो तो दीर्घायु करता है यदि निर्बल या पाप प्रभाव में आया हो तो क्षीणआयु करता है व मित्रो द्वारा अपमानित भी कराता है ...स्व-राशिस्थ या उच्च का शुक्र गो तो जातक को अनायास धन-प्राप्ति होती है....यह धन संपत्ति विरासत से, सट्टे या लोटरी से , या किसी विधवा स्त्री द्वारा दी जाती है ....ऐसे जातक को बड़े उद्योगों से भी धन लाभ मिलता है अष्टम अधिपति अवं अष्टम भाव पर शुभ प्रभाव हो तो जातक धार्मिक वृत्ति वाल होता है तथा व्रताधिक अधिक करता है फलत: जठराग्नि क्षीण हो जाने के कारन से भी मृत्यु संभव होती है....ऐसे जातक का अत्यधिक दुस्साहस भी उसका मृत्युकारक बनता है...अष्टमस्थ प्रबल पाप गृह हो और कुंडली में योगकारक हो तो तो किसी भी स्पर्धा, चुनाव, प्रतिस्पर्धा आदि में विजय आसान होती है...
अष्टमस्थ वृश्चिक राशी ...स्वामी मंगल
अष्टमस्थ वृश्चिक राशी हो तो मंगल लग्नेश और अष्टमाधिपति बनता है...ऐसे में अष्टम भाव पर शुभ प्रभाव हो तो जातक की आयु दीर्घ होती है ...यदि अष्टम भाव व अष्टमाधिपति पाप प्रभाव में हो तो उसका मस्तिष्क विकृत हो जाता है तथा वह आत्म घात कर लेता..जितने भी आत्महत्या के केस होते हैं मंगल उसमे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कारन मंगल उत्तेजना, आवेश, अहंकार का पर्याय है...अत: ये जातक अथवा जातिका को उकसाता है ....यदि शनि की दृष्टि लग्न और मंगल पर हो तो जातक दुसरे की हत्या कर सकता है ...ऐसे जातक की इच्छा बहुत कुछ खाने की होती है....वह विरुद्ध आहार का भक्षण करता है ..फलत रुधिर विकार (खून में इन्फेक्सन) होता है ..पित्त दूषित हो जाता है तथा शारीर में घाव हो जाने से उसमे कीड़े उत्पन्न होने का भय होता है और यही उसकी मृत्यु का कारण हो सकता है ...अत: ऐसे जातक को जिनका मंगल, शनि और राहु ख़राब हो तुरंत उसकी शांति करा लेनी चाहिए और अपने आचरण में यथा संभव सुधर लाना चाहिए....ॐ शांति :
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ धनु राशी...स्वामी गुरु
यदि अष्टम भाव में धनु राशी हो तो गुरु आएश और अष्टमेश बनता है यदि गुरु की स्थिति बलवान हो अवं अष्टम भाव पर पापी ग्रहों का प्रभाव हो तो जातक विदेशवास करता है तह वहां अच्छा धन अर्जित करता है ...उसकी आयु दीर्घ होती है तथा वह लम्बी बीमारियों से बचा रहता है पाप प्रबह्व में आया गुरु भिन्न-भिन्न रोग उत्पन्न करता है ...यदि कुंडली का अष्टम भाव या अष्टमस्थ मगल से प्रभावित हो तो जातक को विविध रोग होते हैं यदि बुध से प्रभावित हो तो प्राय: कर्ण रोग होते हैं कर्न्स्रव अथवा कर्ण शूल से पीड़ा होती यदि शुक्र से सम्बंधित हो तो उदरशूल से मृत्यु तक संभव है यदि स्वराशी का हो तो बहुभोजन के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है सूर्य से प्रभावित हो तो विशुचिका, कब्ज जहर आदि से पीड़ा होती है ....सूर्य राहु का योग अष्टम में हो तो पिता अथवा स्वयं की किसी षट्कर्म द्वारा मृत्यु संभव....
अष्टमस्थ मकर राशी स्वामी शनि
यदि अष्टम भाव में मकर राशी हो तो शनि अष्टमेश व नवमेश बनता है ...नवमेश होने जहाँ वह शुभ है वहीँ अष्टमेश हो जाने से प्रबल पापी भी है शनि का बलवान होना जातक को लम्बी आयु देता है...मृत्यु के समय उसका चित्त स्थिर होता है तथा बिना किसी व्याधि के अपने समय पर ही मृत्यु होती है ऐसे जातक की रूचि आध्यात्म, परा विद्या, साधना, विभिन्न मंत्रो को सिद्धहस्त करने की खूबी होती है...उसे एकाकी जीवन पसंद होता है ऐसे जातक को उच्च पद की प्राप्ति है यदि शनि निर्बल हो आयु को क्षीण करता है ऐसा जातक वायु रोगों से पीड़ित होता है ..ऐसे जातक के निर्बल शनि के कारण उस पर नकारात्मक उर्जा का प्रभाव ज्यादा रहता है फलत: ऐसे जातक को कुछ अप्राकर्तिक पीड़ा जिसे आम भाषा में उपरी का असर बोलते हैं...को झेलना पड़ सकता है ,,इसके साथ उदार शूल, अर्श, भगंदर जैसे रोग भी उसे घेरे रहते हैं.....शिव ॐ
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
अष्टमस्थ कुम्भ राशी..... स्वामी शनि ....
यदि अष्टम में कुम्भ राशी हो तो शनि सप्तमेश व अष्टमेश बनता है इसकी बलवान स्थिति जातक को दीर्घायु बनाती है ...वहीँ दाम्पत्य जीवन में अशुभता भी लती है तथा जीवन साथी स्वाभाव उग्र, रुखा तथा कर्कश वाणी बोलने वाला मिलता है पति या पत्नी के द्वारा अपमानित होने के योग बनते हैं...यदि शनि निर्बल अवस्था में हो तो अपनी दशा -अन्तर्दशा में अशुभ फल देता है ...शुक्र की दशा में शनि का अंतर अथवा शनि की दशा में शक्र का अंतर जातक को दिवालिया बना देता है....जातक के घर को अग्नि से जल जाने का भय रहता है ...तथा उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है ...अत्यधिक श्रम करने का बाद भी जातक नवीन घर नहीं बना पाता तथा अधिक श्रम करने से, वायु के दूषित होने से तथा घावों के साद जाने से मृत्यु की सम्भावना रहती है ...
अष्टमस्थ मीन राशी...स्वामी गुरु
यदि अष्टम भाव में मीन राशी हो तो गुरु पंचमेश व अष्टमेश बनता है गुरु की बलवान स्थिति जातक को पुत्र सुख देती है लेकिन निर्बल गुरु संतान से अपमानित करता है...गुरु बलवान हो तो जातक की आयु लम्बी होती है...निर्बल अवस्था में स्थित गुरु और मीन राशी पर पाप गृह की दृष्टि जातक को उसकी जनम भूमि में नहीं रहने देती...उसे विदेशवास करना पड़ता है...आयु के उत्तर भाग में प्राय: उदार रोग व अतिसार रोग होने की प्रबल सम्भावना होती है...पित्त की थेली या पित्त के दूषित हो जाने ..पित्त ज्वर भी मृत्यु का कारण बनता है...जल में डूबकर मृत्यु की सम्भावना को नाकारा नहीं जा सकता ...तीसरा ...छटा और आठवां भाव क्रमश: एक दुसरे से प्रबल पापी भाव होते हैं...अत: यहाँ शुभ गृह या पाप गृह की स्थिति, दृष्टि, व भावेश की स्थिति..बहुत महत्वपूर्ण होती है....
Friday, 18 January 2013
saptmesh ka vibhinn bhav fal..19/01/2013
शुभ प्रभात
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश का विभिन्न भावगत फल....
यदि सप्तमेश लग्न में हो तो जातक रूपवान और कामी होता है...लेकिन उसे वात रोग (वायु जनित रोग : गैस, मांस-पेशियों में दर्द ) तथा वह लम्पट एवं दुष्ट प्रकृति का होता है ...ऐसा जातक अपनी पत्नी में रूचि न रख इधर-उधर तांक -झांक करता है ...यदि सप्तमेश शुभ गृह हो अथवा शुभ प्रभाव में हो तो जातक अपने पत्नी-बच्चों से अत्यधिक प्रेम करने वाला होता है यदि सप्तमेश अशुभ प्रभाव में आया हो या पापी अथवा क्रूर गृह हो तो जातक शोकातुर व स्नेह रहित होता है अपने मतलब से मतलब रखता है दूसरों के हित की उसे चिंता नहीं होती ....
यदि सप्तमेश धन भाव (द्वितीय ) में हो तो जातक की स्त्री दुष्ट स्वभाव की, पुत्रों की इच्छा करने वाली..और मात्र पुत्रो से प्रेम करने वाली होती है पाप प्रभावी अथवा पापी सप्तमेश हो तो जातक की स्त्री दुश्चरित्र होती है ..उसे केवल अपने रूप सौन्दर्य से मतलब होता है ...अपने इस रूप सौन्दर्य का पति के साथ रहते भी दुरूपयोग कर पराये पुरषों से सम्बन्ध रखती है...जातक यह सब जानकर भी कुछ नहीं कर पाता...घर में नित्य कलह का वातावरण रहता है ..मंगल व राहु जैसे उग्र गृह का प्रभाव सप्तम पर अथवा सप्तमेश पर हो तो जातक की पत्नी पूर्णतया व्यभिचार में लिप्त रहती है ...यहाँ जातक की स्थिति मृत्यु सामान होती है....यदि सप्तमेश शुभ प्रभाव में अथवा शुभ गृह हो तो जातक की स्त्री अपने पति पर सर्वस्व न्योछावर कर देती है प्रेम की अनूठी मिशल बनती है ...पति के धन वृद्धि करने वाली और सच्चरित्रा होती है...उसे पुत्रों का सुख मिलता है यदि सप्तमेश और गुरु स्त्री राशी में हो तो पहली संतान बेटी होती है बाद में पुत्र होते हैं...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:सप्तमेश का विभिन्न भावगत फल.....
यदि सप्तमेश तृतीय भाव में गया हो तो जातक की पत्नी मृत-वत्स होती है अर्थात मृत संतान को उत्पन्न करती है ...पुत्रियाँ जीवित रहती हैं भरपूर प्रयत्न करने पर एक पुत्र ही जी पता है यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक की पत्नी अपने देवर से सम्बन्ध रखती है ...यदि शुभ प्रभाव में हो तो जातक का अत्म्बस्ल बना रहता है ..वह स्वयम दुखी रह कर भी बंधू-बंधवो से प्रेम रखता है...उनकी भरपूर मदद करता है स्त्री को अत्यधिक प्रेम करता है...वह स्वयम भी रूपवान, गुनी, चतुर, होता है कई कार्य करता है तथा अपने धन का संचय करता......ऐसा जातक अपना भविष्य खुद बनाते हैं ..अपने पुरषार्थ बल पर...उन्नति करते हैं...
यदि सप्तमेश चतुर्थ में हो तो जातक पिता से बैर रखता है ...सदा पिता को नीचा दिखने के उपायों को खोजने में लगा रहता है...पिता की संपत्ति को हड़पने वाल होता है ...पिता और पुत्र दोनों एक साथ नहीं रह सकते और ये योग जब और विकत हो जाता जब कुंडली में सूर्य और शनि एक साथ हो...ऐसा जातक माता को तुच्छ समझता है ...माता-पिता सदा रोगों से ग्रस्त रहते हैं.....यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक स्वयं धर्मात्मा होता है, माता-पिता का सम्मान करता है सत्य वक्ता और सुसंस्कृत विचारों वाल होता है...उसे दन्त रोग से पीड़ा होती है ...पत्नी का चरित्र अच्छा नहीं होता....पुत्रों से ताड़ना मिलती है जीवन का उत्तरार्ध सुखी नहीं होता
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश पंचम भाव में..
यदि सप्तमेश पंचम भाव में हो तो जातक स्वाभिमानी एवं सर्वदा प्रसन्न रहने वाला होता है आय के अच्छे साधन होने से वह धनी होता है पुत्र आज्ञाकारी और पिता की कीर्ति को फ़ैलाने वाले होते हैं ...धन की बेतहाशा वृद्धि होती है पापी गृह अथवा पाप प्रभाव में आया पंचमेश पुत्र सुख से हीन व सर्वदा पुत्र और धन की चिंता करने वाला होता है ऐसे जातक की आयु कम होती है...पंचम भाव बुद्धि, पद-प्रतिस्था और त्रिकोण भाव होता है अत: इसका दूषित होना बल, बुद्धि, आयु को क्षीण करेगा ...फिर आयुष्कारक उपाय करने से इनके पुत्र जीवित भी रहते हैं और धन की प्राप्ति भी होती रहती है लेकिन ऐसे जातक विश्वास पात्र नहीं होते..जड़मति एवं दुसरो का अहित करने वाले होते हैं....पत्नी से वैमनस्य रहने के कारण पत्नी प्राय: अपने पिता के घर में जीवन बिताती है ....
सप्तमेश षष्ठ भाव में ......यदि सप्तमेश रिपु भाव (छटे भाव ) में गया हो तो जातक के अपनी पत्नी के साथ अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते ...यहाँ ध्यान रहे एक सर्विदित सूत्र ये है की किसी भाव का स्वामी जब उस से १२ वे स्थान में हो तो उस भाव की हानि होती है ..यहाँ सप्तमेश अपने भाव से १२ वे आ कर बैठ गे तो सप्तम भाव को हानि पहुंचाएगा... ..ऐसे जातक के घर में हमेशा कलह का वातावरण रहता है पत्नी दीर्घकालीन रोगों से घिरी रहती है अथवा जातक का साथ छोड़ देती है...दोनों अवस्थाओ में स्त्री का सुख अल्प होता है...सप्तम भाव यात्रा और डेली रोजगार का प्रतिनिधित्व भी करता है अत: वहां भी कलेश रहेगा...ऐसे जातक वास्तव में बेचारा होता है ग्रहों के खेल के आगे विवश...उसकी यही मानसिक कुंठा क्रोधी बनाती है ..फलत: झगडे होते हैं..shatru बनते हैं..जताक्का जीवन विषमय हो जाता है...राज्य पक्ष से बैर..मन-सम्मान की हानि, शत्रुओं से हानि, बाल्यावस्था कष्ट में, ..पापी सप्तमेश स्व राशी में हो तो जातक अपनी स्त्री के साथ अत्यधिक रति करने से क्षीण हो कर शीघ्र ही रोग ग्रस्त हो मृत्यु के मुख में चला जाता है
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश सप्तम में.....
यदि सप्तमेश सप्तम में हो तो तो यहाँ सप्तम और सप्तमेश का भाव बल बढ़ता है अर्थात जातक को जीवन साथी का पूर्ण सुख मिलता है...ऐसा जातक स्वयं भी विद्वान् एवं व्यवहारकुशल होता है ततः उसे जीवन साथी भी ऐसा ही मिलता है ...ऐसा जातक छल-प्रपंच से रहित साधू स्वभावी एवं तेजस्वी होता है ...उसे यात्राओं से, अपने स्वयं के उद्योग से पूर्ण लाभ मिलता है ...जातक की पत्नी उसे पूर्ण सुख सहयोग प्रदान करती है ..ऐसा जातक धैर्य शाली तथा समस्त कार्यों को विवेक एवं बुद्धि से करने वाला होता है...मुख्यतया वात रोगों से पीड़ा पहुँचती है....
यदि सप्तमेश अष्टम भाव में हो और पापी ग्रहों से प्रभावित हो तो जातक वेश्यागामी होता है उसका दाम्पत्य जीवन नरकतुल्य होता है..अष्टम भाव बाधक भाव भी होता है अत: जातक की समस्त सांसारिक प्रगति में बाधा पहुँचती है ...(चाहे यहाँ कोई शुभ राशी ही हो लेकिन उस राशी पर अगर कोई पाप गृह बैठता है तो जीवन नरक तुल्य होता है लेकिन यहाँ एक भेद है...अगर पाप गृह मंगल या राहु जैसे हुए...तो जीवन अत्यधिक कष्टकर, विष से मृत्यु ..आदि भोगना पड़ता है और अगर शनि स्वराशी, मूल त्रिकोण राशी में हो तो जातक को अपर कष्ट देकर अंतत: धर्म, आध्यात्म की गहराइयों में ले जाते है और जातक का जीवन सार्थक बना देते हैं..) ऐसे जातक की पत्नी साधारण नयन-नक्श वाली, कटु भाषिणी और पति की परवाह न करने वाली होती है या हर समय रुग्ण अवस्था में रहती है ...अन्य अशुभ योग हो तो विवाह प्रतिबंधक योग फलीभूत होता है ..और अगर सप्तमेश शुभ, प्रभाव में हो...स्त्री, धन, मन-सम्मान सब प्राप्त होता है...जीवन के अत्यधिक कष्ट उसे खोजी प्रकृति का बना देता हैं ...क्रमश:
शुभ प्रभात
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश नवम भाव में
यदि सप्तमेश नवम भाव में हो तो जातक बुद्धिमान, विवेक शील होता है लोग उसके आचरण को अनुकरणीय मानते हैं ..एक अद्भुत संयोग...सप्तमेश का भाग्य भाव (9th) में होना विवाहोपरांत तीव्र भाग्योदय का प्रतीक है ...और यदि ऐसा सप्तमेश लग्नेश की दृष्टि में हो तो जातक नीतिकुशल होता है तथा राजनीतिक क्षेत्र में आपार सफलता अर्जित करता है ...जातक की पत्नी सुंदर, सुशील एवं पति के मन-सम्मान, धन, यश, प्रतिष्ठा को बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करती है ...सप्तमेश का त्रिकोण भाव में जाना इस बात का भी प्रतीक है की विवाह दूरस्थ स्थान से होगा,...लेकिन यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो अथवा अशुह हो तो जातक अनेक स्त्रियों से रमण करने वाला ..एक साथ कई कार्यों को प्रारंभ करने की प्रवृत्ति होती है ..लेकिन हर समय स्त्री भोग की लालसा के कारण वो अपने किसी कार्य में सफल नहीं हो पता ..अत; किसी मित्र की कुंडली में ऐसा कोई योग घटित हो रह हो तो तुरंत उसका उपाय कर ले...धन्यवाद...
सप्तमेश की दशम भाव में स्थिति
यदि सप्तमेश दशम भाव में गया हो तो जातक लम्पट, परस्त्रीलोलुप, परधनहारी, क्रोधी, दम्भी, स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाला, जैसे दुर्गुणों से युक्त अहंकारी प्रवृत्ति का होता है .ससुराल में आसक्त ऐसा जातक अपनी ससुराल का लोभी होता है....उसका ससुर एक प्रसिद्द व्यक्ति होता है ...पत्नी अपने सासु के अधिकार में रहती है ..यदि सप्तमेश शुभ गृह अथवा शुभ गृह के प्रभाव में हो तो जातक धर्मात्मा होता है ससुराल से संपत्ति मिलती है...सास अत्यधिक प्रीती रखने वाली होती है ऐसे जातक को पुत्र, धन संपत्ति सभी कुछ प्राप्त होता है ..लेकिन पत्नी उसके अधीन नहीं रहती..फलत: उसे मानसिक कलेश बना रहता है ....शिव ॐ..
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश आय भाव (एकादश ) में...
यदि सप्तमेश आय भाव में हो तो जातक को स्त्री द्वारा धन की प्राप्ति होती है ...इसमें दो कारन हो सकते हैं ..की स्त्री कोई जॉब या व्यवसाय के सञ्चालन से अपने पति को धन देती है अथवा एक योग यह भी है की पति घर जमी बन कर रहे] करे कुछ नहीं और ससुराल से उसे धन मिलता रहे...लेकिन सभी के साथ ऐसा हो यह संभव नहीं...ऐसे जातक को यहाँ कन्या संतति अधिक होती हैं...तथा पुत्र सुख अल्प मिलता है यदि सप्तमेश पापी गृह हो तो प्रवास अधिक करने पड़ते हैं...संतान की चिंता बनी रहती है तथा जातक कंजूस और शठ होता है ...कुल मिला कर ऐसे जातक को विभिन्न स्रोतों से स्त्री जाती से लाभ मिलता है....
यदि सप्तमेश द्वादश भाव में हो तो जातक दरिद्र और कृपण होता है...स्त्री अधिक व्यय करने वाली होती है घर के कम काज में अधिक रूचि नहीं लेती अपितु बहार सैर -सपाटे में मग्न रहती है..स्वाभाव से चालक और मलिन बुद्धि की होती है ऐसे जातक का दाम्पत्य सुख न के बराबर होता है ...प्राय: ऐसे जातक को बड़ी आयु में विवाह होता है और पत्नी की आयु भी बड़ी होती है ...जातक अपने आपको घर-परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त रखता है फलत: पत्नी की और ज्यादा ध्यान नहीं दे पता वस्त्रों का व्यापर करने वाला ऐसा जातक पत्नी के कारन बदनाम भी हो जाता है अत्यधिक पाप प्रभाव में आया सप्तमेश पत्नी को इतना नीच बना देता है की वैश्य भी उसके सम्मुख तुच्छ दिखती है ...ऐसे जातक को तमाम जीवन रहत नहीं मिलती ...और कल्पते हुए उसके प्राण निकलते हैं....
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश का विभिन्न भावगत फल....
यदि सप्तमेश लग्न में हो तो जातक रूपवान और कामी होता है...लेकिन उसे वात रोग (वायु जनित रोग : गैस, मांस-पेशियों में दर्द ) तथा वह लम्पट एवं दुष्ट प्रकृति का होता है ...ऐसा जातक अपनी पत्नी में रूचि न रख इधर-उधर तांक -झांक करता है ...यदि सप्तमेश शुभ गृह हो अथवा शुभ प्रभाव में हो तो जातक अपने पत्नी-बच्चों से अत्यधिक प्रेम करने वाला होता है यदि सप्तमेश अशुभ प्रभाव में आया हो या पापी अथवा क्रूर गृह हो तो जातक शोकातुर व स्नेह रहित होता है अपने मतलब से मतलब रखता है दूसरों के हित की उसे चिंता नहीं होती ....
यदि सप्तमेश धन भाव (द्वितीय ) में हो तो जातक की स्त्री दुष्ट स्वभाव की, पुत्रों की इच्छा करने वाली..और मात्र पुत्रो से प्रेम करने वाली होती है पाप प्रभावी अथवा पापी सप्तमेश हो तो जातक की स्त्री दुश्चरित्र होती है ..उसे केवल अपने रूप सौन्दर्य से मतलब होता है ...अपने इस रूप सौन्दर्य का पति के साथ रहते भी दुरूपयोग कर पराये पुरषों से सम्बन्ध रखती है...जातक यह सब जानकर भी कुछ नहीं कर पाता...घर में नित्य कलह का वातावरण रहता है ..मंगल व राहु जैसे उग्र गृह का प्रभाव सप्तम पर अथवा सप्तमेश पर हो तो जातक की पत्नी पूर्णतया व्यभिचार में लिप्त रहती है ...यहाँ जातक की स्थिति मृत्यु सामान होती है....यदि सप्तमेश शुभ प्रभाव में अथवा शुभ गृह हो तो जातक की स्त्री अपने पति पर सर्वस्व न्योछावर कर देती है प्रेम की अनूठी मिशल बनती है ...पति के धन वृद्धि करने वाली और सच्चरित्रा होती है...उसे पुत्रों का सुख मिलता है यदि सप्तमेश और गुरु स्त्री राशी में हो तो पहली संतान बेटी होती है बाद में पुत्र होते हैं...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:सप्तमेश का विभिन्न भावगत फल.....
यदि सप्तमेश तृतीय भाव में गया हो तो जातक की पत्नी मृत-वत्स होती है अर्थात मृत संतान को उत्पन्न करती है ...पुत्रियाँ जीवित रहती हैं भरपूर प्रयत्न करने पर एक पुत्र ही जी पता है यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक की पत्नी अपने देवर से सम्बन्ध रखती है ...यदि शुभ प्रभाव में हो तो जातक का अत्म्बस्ल बना रहता है ..वह स्वयम दुखी रह कर भी बंधू-बंधवो से प्रेम रखता है...उनकी भरपूर मदद करता है स्त्री को अत्यधिक प्रेम करता है...वह स्वयम भी रूपवान, गुनी, चतुर, होता है कई कार्य करता है तथा अपने धन का संचय करता......ऐसा जातक अपना भविष्य खुद बनाते हैं ..अपने पुरषार्थ बल पर...उन्नति करते हैं...
यदि सप्तमेश चतुर्थ में हो तो जातक पिता से बैर रखता है ...सदा पिता को नीचा दिखने के उपायों को खोजने में लगा रहता है...पिता की संपत्ति को हड़पने वाल होता है ...पिता और पुत्र दोनों एक साथ नहीं रह सकते और ये योग जब और विकत हो जाता जब कुंडली में सूर्य और शनि एक साथ हो...ऐसा जातक माता को तुच्छ समझता है ...माता-पिता सदा रोगों से ग्रस्त रहते हैं.....यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो तो जातक स्वयं धर्मात्मा होता है, माता-पिता का सम्मान करता है सत्य वक्ता और सुसंस्कृत विचारों वाल होता है...उसे दन्त रोग से पीड़ा होती है ...पत्नी का चरित्र अच्छा नहीं होता....पुत्रों से ताड़ना मिलती है जीवन का उत्तरार्ध सुखी नहीं होता
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश पंचम भाव में..
यदि सप्तमेश पंचम भाव में हो तो जातक स्वाभिमानी एवं सर्वदा प्रसन्न रहने वाला होता है आय के अच्छे साधन होने से वह धनी होता है पुत्र आज्ञाकारी और पिता की कीर्ति को फ़ैलाने वाले होते हैं ...धन की बेतहाशा वृद्धि होती है पापी गृह अथवा पाप प्रभाव में आया पंचमेश पुत्र सुख से हीन व सर्वदा पुत्र और धन की चिंता करने वाला होता है ऐसे जातक की आयु कम होती है...पंचम भाव बुद्धि, पद-प्रतिस्था और त्रिकोण भाव होता है अत: इसका दूषित होना बल, बुद्धि, आयु को क्षीण करेगा ...फिर आयुष्कारक उपाय करने से इनके पुत्र जीवित भी रहते हैं और धन की प्राप्ति भी होती रहती है लेकिन ऐसे जातक विश्वास पात्र नहीं होते..जड़मति एवं दुसरो का अहित करने वाले होते हैं....पत्नी से वैमनस्य रहने के कारण पत्नी प्राय: अपने पिता के घर में जीवन बिताती है ....
सप्तमेश षष्ठ भाव में ......यदि सप्तमेश रिपु भाव (छटे भाव ) में गया हो तो जातक के अपनी पत्नी के साथ अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते ...यहाँ ध्यान रहे एक सर्विदित सूत्र ये है की किसी भाव का स्वामी जब उस से १२ वे स्थान में हो तो उस भाव की हानि होती है ..यहाँ सप्तमेश अपने भाव से १२ वे आ कर बैठ गे तो सप्तम भाव को हानि पहुंचाएगा... ..ऐसे जातक के घर में हमेशा कलह का वातावरण रहता है पत्नी दीर्घकालीन रोगों से घिरी रहती है अथवा जातक का साथ छोड़ देती है...दोनों अवस्थाओ में स्त्री का सुख अल्प होता है...सप्तम भाव यात्रा और डेली रोजगार का प्रतिनिधित्व भी करता है अत: वहां भी कलेश रहेगा...ऐसे जातक वास्तव में बेचारा होता है ग्रहों के खेल के आगे विवश...उसकी यही मानसिक कुंठा क्रोधी बनाती है ..फलत: झगडे होते हैं..shatru बनते हैं..जताक्का जीवन विषमय हो जाता है...राज्य पक्ष से बैर..मन-सम्मान की हानि, शत्रुओं से हानि, बाल्यावस्था कष्ट में, ..पापी सप्तमेश स्व राशी में हो तो जातक अपनी स्त्री के साथ अत्यधिक रति करने से क्षीण हो कर शीघ्र ही रोग ग्रस्त हो मृत्यु के मुख में चला जाता है
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश सप्तम में.....
यदि सप्तमेश सप्तम में हो तो तो यहाँ सप्तम और सप्तमेश का भाव बल बढ़ता है अर्थात जातक को जीवन साथी का पूर्ण सुख मिलता है...ऐसा जातक स्वयं भी विद्वान् एवं व्यवहारकुशल होता है ततः उसे जीवन साथी भी ऐसा ही मिलता है ...ऐसा जातक छल-प्रपंच से रहित साधू स्वभावी एवं तेजस्वी होता है ...उसे यात्राओं से, अपने स्वयं के उद्योग से पूर्ण लाभ मिलता है ...जातक की पत्नी उसे पूर्ण सुख सहयोग प्रदान करती है ..ऐसा जातक धैर्य शाली तथा समस्त कार्यों को विवेक एवं बुद्धि से करने वाला होता है...मुख्यतया वात रोगों से पीड़ा पहुँचती है....
यदि सप्तमेश अष्टम भाव में हो और पापी ग्रहों से प्रभावित हो तो जातक वेश्यागामी होता है उसका दाम्पत्य जीवन नरकतुल्य होता है..अष्टम भाव बाधक भाव भी होता है अत: जातक की समस्त सांसारिक प्रगति में बाधा पहुँचती है ...(चाहे यहाँ कोई शुभ राशी ही हो लेकिन उस राशी पर अगर कोई पाप गृह बैठता है तो जीवन नरक तुल्य होता है लेकिन यहाँ एक भेद है...अगर पाप गृह मंगल या राहु जैसे हुए...तो जीवन अत्यधिक कष्टकर, विष से मृत्यु ..आदि भोगना पड़ता है और अगर शनि स्वराशी, मूल त्रिकोण राशी में हो तो जातक को अपर कष्ट देकर अंतत: धर्म, आध्यात्म की गहराइयों में ले जाते है और जातक का जीवन सार्थक बना देते हैं..) ऐसे जातक की पत्नी साधारण नयन-नक्श वाली, कटु भाषिणी और पति की परवाह न करने वाली होती है या हर समय रुग्ण अवस्था में रहती है ...अन्य अशुभ योग हो तो विवाह प्रतिबंधक योग फलीभूत होता है ..और अगर सप्तमेश शुभ, प्रभाव में हो...स्त्री, धन, मन-सम्मान सब प्राप्त होता है...जीवन के अत्यधिक कष्ट उसे खोजी प्रकृति का बना देता हैं ...क्रमश:
शुभ प्रभात
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश नवम भाव में
यदि सप्तमेश नवम भाव में हो तो जातक बुद्धिमान, विवेक शील होता है लोग उसके आचरण को अनुकरणीय मानते हैं ..एक अद्भुत संयोग...सप्तमेश का भाग्य भाव (9th) में होना विवाहोपरांत तीव्र भाग्योदय का प्रतीक है ...और यदि ऐसा सप्तमेश लग्नेश की दृष्टि में हो तो जातक नीतिकुशल होता है तथा राजनीतिक क्षेत्र में आपार सफलता अर्जित करता है ...जातक की पत्नी सुंदर, सुशील एवं पति के मन-सम्मान, धन, यश, प्रतिष्ठा को बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करती है ...सप्तमेश का त्रिकोण भाव में जाना इस बात का भी प्रतीक है की विवाह दूरस्थ स्थान से होगा,...लेकिन यदि सप्तमेश पाप प्रभाव में हो अथवा अशुह हो तो जातक अनेक स्त्रियों से रमण करने वाला ..एक साथ कई कार्यों को प्रारंभ करने की प्रवृत्ति होती है ..लेकिन हर समय स्त्री भोग की लालसा के कारण वो अपने किसी कार्य में सफल नहीं हो पता ..अत; किसी मित्र की कुंडली में ऐसा कोई योग घटित हो रह हो तो तुरंत उसका उपाय कर ले...धन्यवाद...
सप्तमेश की दशम भाव में स्थिति
यदि सप्तमेश दशम भाव में गया हो तो जातक लम्पट, परस्त्रीलोलुप, परधनहारी, क्रोधी, दम्भी, स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाला, जैसे दुर्गुणों से युक्त अहंकारी प्रवृत्ति का होता है .ससुराल में आसक्त ऐसा जातक अपनी ससुराल का लोभी होता है....उसका ससुर एक प्रसिद्द व्यक्ति होता है ...पत्नी अपने सासु के अधिकार में रहती है ..यदि सप्तमेश शुभ गृह अथवा शुभ गृह के प्रभाव में हो तो जातक धर्मात्मा होता है ससुराल से संपत्ति मिलती है...सास अत्यधिक प्रीती रखने वाली होती है ऐसे जातक को पुत्र, धन संपत्ति सभी कुछ प्राप्त होता है ..लेकिन पत्नी उसके अधीन नहीं रहती..फलत: उसे मानसिक कलेश बना रहता है ....शिव ॐ..
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमेश आय भाव (एकादश ) में...
यदि सप्तमेश आय भाव में हो तो जातक को स्त्री द्वारा धन की प्राप्ति होती है ...इसमें दो कारन हो सकते हैं ..की स्त्री कोई जॉब या व्यवसाय के सञ्चालन से अपने पति को धन देती है अथवा एक योग यह भी है की पति घर जमी बन कर रहे] करे कुछ नहीं और ससुराल से उसे धन मिलता रहे...लेकिन सभी के साथ ऐसा हो यह संभव नहीं...ऐसे जातक को यहाँ कन्या संतति अधिक होती हैं...तथा पुत्र सुख अल्प मिलता है यदि सप्तमेश पापी गृह हो तो प्रवास अधिक करने पड़ते हैं...संतान की चिंता बनी रहती है तथा जातक कंजूस और शठ होता है ...कुल मिला कर ऐसे जातक को विभिन्न स्रोतों से स्त्री जाती से लाभ मिलता है....
यदि सप्तमेश द्वादश भाव में हो तो जातक दरिद्र और कृपण होता है...स्त्री अधिक व्यय करने वाली होती है घर के कम काज में अधिक रूचि नहीं लेती अपितु बहार सैर -सपाटे में मग्न रहती है..स्वाभाव से चालक और मलिन बुद्धि की होती है ऐसे जातक का दाम्पत्य सुख न के बराबर होता है ...प्राय: ऐसे जातक को बड़ी आयु में विवाह होता है और पत्नी की आयु भी बड़ी होती है ...जातक अपने आपको घर-परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त रखता है फलत: पत्नी की और ज्यादा ध्यान नहीं दे पता वस्त्रों का व्यापर करने वाला ऐसा जातक पत्नी के कारन बदनाम भी हो जाता है अत्यधिक पाप प्रभाव में आया सप्तमेश पत्नी को इतना नीच बना देता है की वैश्य भी उसके सम्मुख तुच्छ दिखती है ...ऐसे जातक को तमाम जीवन रहत नहीं मिलती ...और कल्पते हुए उसके प्राण निकलते हैं....
Sunday, 30 December 2012
सप्तम भावस्थ विभिन्न गृह फल......30/12/2012
सूर्य .....यदि सप्तम भाव में सूर्य हो तो जातक के विवाह में विलम्ब होता है दाम्पत्य जीवन का पूर्वार्ध प्राय: कलहपूर्ण होता है पति-पत्नी के बीच में विचार वैमनस्य रहता है ...मिथुन, तुला कुम्भ का सूर्य जातक को शिक्षा विभाग से सम्बंधित करता है तथा इसी में उसकी उन्नति होती है ऐसा जातक कुशल नीतिज्ञ होता है तथा उसे एक या दो संतान होती है..जीवन के पूर्वार्ध में ही जातक के चश्मा चढ़ने की नौबत आ जाती है ...अग्नि राशी का सूर्य विवाह में देरी करता है अपवाद रूप से दो विवाह होते हैं ऐसे जातक के सर पर तालू में बल कम होते हैं...ऐसे जातक की प्रवृत्ति स्वतंत्र रहने की होती है...यदि सूर्य स्त्री राशियों में हो तो व्यापार से लाभ मिलता है..और राजनीती में जाने से सफलता मिलती है ...
यदि सूर्य जल राशी का हो तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में उन्नति करता है सिंचाई विभाग में अधिकारी होता है अथवा विज्ञानं के क्षेत्र में चला जाता है...पुरुष राशी का सूर्य हो तो जीवन पर्यंत उतर-चढाव बने रहते हैं...संतान कम होती है ...
स्त्री राशी का सूर्य अधिक संतान देता है प्राय: सप्तमस्थ सूर्य के निम्न फल अनुभव में आते हैं पति अत्थ्वा पत्नी प्रभावशाली, व्यव्हार कुशल, आपातकाल में एक दुसरे के सहायक, अतिथि सेवक, तथा नौकरों से प्रेम से कार्य करने में कुशल...ऐसे जातकों को उद्योग या साझेदारी में भी सफलता मिलती है
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्भ ....ये पुरुष राशी होती हैं ...और वृषभ, कर्क,कन्या,वृश्चिक,मकर, और मीन स्त्री संज्ञक राशी...
मेष, कर्क, तुला, मकर...ये चर राशी
वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ..ये स्थिर राशी
मिथुन, कन्या, धनु, और मीन....द्वि स्वाभाव राशी..
मेष, सिंह धनु,....अग्नि राशी..
कर्क, वृश्चिक, और मीन.....जल तत्व..
वृषभ, कन्या और मकर....पृथ्वी तत्व...
मिथुन, तुला, और कुम्भ.....वायु तत्व...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ चंद्रमा फल....
यदि सप्तम भाव में चन्द्र हो तो जातक को दाम्पत्य जीवन का पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता है ..उच्चस्थ चन्द्र द्विभार्य योग बनाता है ...अर्थत जातक या जातिका के वैवाहिक जीवन में कुछ अड़चन ..परेशानी, मत विभिन्नता के कारन पति-पत्नी का अलग रहना...अथवा तलक जैसी नौबत आती हैं ..अत: २१ से २४ वर्ष की आयु तक विवाह से बचे अथवा कोई उपाय करें....हालाँकि ऐसे जातक का विवाह के शीघ्र बाद भाग्योदय होता है और पत्नी के रहने तक उन्नति होती रहती है ..पत्नी से अलगाव या मृत्यु पश्चत स्थिति विपरीत बन जाती है ...ऐसे जातक के जीविका के साधन भी बदलते रहते हैं ..चन्द्र चंचल होता है सौर मंडल में सर्वाधिक गति वाला गृह होने के कारन मन, धन का कारक होता है...जीवन साथी का चंचल होना स्वाभाविक है...और यहीं से भूले प्रारंभ होती हैं...इसलिए इस उपरोक्त समय से बचना चाहिए अथवा कोई उपाय कर लेना चाहिए....ऐसे जातक मन, व्यवसाय, नौकरी कुछ भी स्थिर नहीं रह पाती ...
जिस जातक की कुंडली में सप्तम स्थान में चन्द्र हो उसे किरणे की दुकान, दूध, मेडिकल स्टोर , होटल, ढाबा, बेकरी , बीमे का कार्य, चंडी, इत्यादी का कार्य लाभप्रद रहता है...और अगर सप्ताम्स्थ चन्द्र पर गुरु जैसे सात्विक गृह की दृष्टि हो तो सोने पे सुहागा...उपरोक्त कार्यो के आलावा प्रिंटिंग, प्रकाशन,किसी सन्स्थ का अध्यक्ष,..आदि...अत: ऐसे जातको को इस और विचार करना चाहिए...पुरुष राशी का चन्द्र स्व-पत्नी में आसक्ति बनाये रखता है ...स्त्री राशी का चन्द्र व्यभिचार की और आकृष्ट करता है ...यदि चन्द्र अग्नि राशी का हो तो जीवन साथी का चेहरा गोल होता है और कुछ समय पश्चत तुन्दालता आती है...जातक majakiya swabhv का होता है..हर समय खुश रहने वाल...लेकिन भावुक...भी होता है......वायु तत्व का चन्द्र हो तो जीवन साथी दार्शनिक, ज्ञानी और प्रभावशाली होता है
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ मंगल फल ...
सप्तम भाव में मंगल हो तो जातक की स्त्री और स्वयं जातक दोनों ही उग्र स्वाभाव के होते हैं...अपने आपको एक दुसरे श्रेष्ठ दिखाना इनकी आदत और दिनचर्या में शामिल होती है....अपनी कही घटिया बात..अल्प ज्ञान की बात को सर्वोपरि मन न और दुसरो की कही हुई उत्तम बात में निम्नता देखना इनकी खासियत होती है ...ये मगली योग भी कहलाता है मंगली योग (१, ४, ७, ८, १०, 12) एसा मंगल होने से योग बनता है ...ऐसे जातक के जीवन में दाम्पत्य जीवन में कलह -कलेश का वातावरण बन न कोई बड़ी बात नहीं...अहेंकर इतना की अपने आगे किसी को कुछ न समझना ...और अपना प्रभुत्व स्थापित करना इनका मेन उद्देश्य होता है ....
मगल सप्तम भाव में किशी भी राशी का हो...एक फल बहुत अच्छे से समझ आया की ऐसा जातक हर कम करने को तत्पर रहता है लेकिन उसे सफलता पूर्वक पूरा करने में सक्षम नहीं होता विघ, बाधा, रोक-रूकावट इतनी होती हैं की उसकी हिम्मत पस्त हो जाती है.....जिन लोगो को ऐसा अनुभव हो उन्हें तत्काल कोई शुभ मुहूर्त देख मंगल के जप करवा इसकी शांति का लेनी चाहिए ...और अपने मित्रो, अपने से छोटो को प्रेम पूर्वक बोलना चाहिए...अगर वे किसी भी प्रकार अपने किसी कार्य -उद्योग में सफल हो जाते हैं तो प्रतिपक्षियो से स्पर्धा...झगडे टंटे चलते रहते हैं ....
यदि मंगल अग्नि राशी का हो तो प्रेस, का धंधा लाभ दायक रहता है .....प्रथ्वी तत्व का हो तो भवन निर्माण, खेतीबाड़ी, का व्यवसाय...लाभ दायक..., वायु तत्व में हो तो वाहन चालक, वाहन को मरम्मत करने का कम, वायु यान चलाने का कम अर्थात पायलट तथा जल तत्व का मंगल हो सर्जन और इन्जिनिएरिंग जैसे कार्य लाभदायक रहते हैं ..यदि स्त्री राशी का सप्त्मष्ठ मंगल हो तो जातक संकटकाल में घबराता है ...लेकिन पुरुष राशी में हो तो धैर्यशाली व सहिष्णु होता है ऐसे जातक के मित्र बहुत कम होते हैं, पत्निसुख कम तथा साले का सुख भी अल्प होता है..... इस भाव का मंगल डाक्टरों , सर्जन , पुलिस अधिकारीयों के लिए शुभ फलदायक होता है फैज्दारी के वकीलों को ऐसा मंगल यशोभागी बनता है ..इतने पर भी जातक में कामेच्छा तीव्र होती है ..वो कोई अनुचित कार्य करे तो वो उजागर हो जाता है ...झगडे झंझट तो चलते ही रहते हैं....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ बुध का फल......
यदि सप्तमस्थ बुध हो तो जातक को स्त्री सुख तो मिलता है ..लेकिन रति सुख के समय ऐसा जातक शीघ्र ही स्खलित हो जाता है ..विवाह के समय झगडे चलते हैं ...ऐसा जातक लेखक हो तो समय संकट में भी व्यतीत होता है हाँ, स्त्री के मामले में जातक सौभाग्यशाली कहा जा सकता है .....धन संग्रह करने की रूचि उसमे स्वाभाविक होती है तथा पति के प्रत्येक कार्य में उसे सहयोग करती है ऐसे जातक की स्त्री पुरुषाकृति की तथा कर्कश वाणी बोलने वाली होती है ...
सप्त्मस्थ गुरु का फल...
यदि गुरु सप्तमस्थ हो तो शुभ फल प्राप्त होते हैं ऐसा प्राचीन मनीषयों का मत है लेकिन अनुभव में शुभ फल कम अशुभ फल अधिक मिले हैं अग्नि राशियों और मिथुन राशी का सप्त्मस्थ गुरु शिक्षा के लिए शुभ फलदाता होता है कारण मिथुन राशी बौद्धिक राशी के अंतर्गत आती है ऐसा जातक पढ़ाकू होता है ..पत्नी शुद्ध सात्विक विचारो की मलती है ...ऐसा जाता उच्च शिक्षा प्राप्त कर शिक्षक, न्यायाधीश , या वकील बन जाता है शिक्षा-विभाग में नौकरी करने वालो तथा वकीलों के लिए यह योग शुभ होता है ..जल राशी या कन्या राशी में रहने पर बुध सांसारिक सुख में न्यूनता लता है ..प्राय: पति-पत्नी में सम्बन्ध मधुर नहीं रहते यदि गुरु अशुभ प्रभाव में हो तो जीवन-साथी जातक को छोड़ कर भाग जाता है या तलक की नौबत आ जाती है...यदि गुरु शनि से प्रभावित हो तो जातक को विवाह न करने की इच्छा बनती है ...यदि राहु साथ में हो तो विवाह प्रतिबंधक योग निष्पन्न हो जाता है अपवाद रूप शादी हो भी जाये तो पति-पत्नी में अलगाव अथवा तलक की नौबत आ जाती है...लेकिन तलक नहीं होता...एक-दुसरे से अलग रहते हैं....नीच का अथवा तुला राशी में स्थित गुरु द्विभार्या योग बनत है....यानि दो विवाह होते हैं...पुएरुष राशी का गुरु हो तो जातक पत्नी को मात्र भोग्या समझता है ...जातक की दृष्टि में पत्नी का दर्जा निम्न श्रेणी का नौकर जैसा होता है...वो अपनी पत्नी को मात्र कामवासना शांत करने का साधन समझता है....यदि स्त्री राशी का गुरु हो तो जातक का व्यापर की और रुझान होता है तथा वह अपनी पत्नी और बच्चों से अत्यधिक प्रेम करता है पत्नी भी पतिपरायण होती है..तहत प्रत्येक कार्यों में मंत्री की भांति सलाह देती है सेवक की तरह सेवा करती है और माता की तरह पालन करती है ऐसे जातक को मध्य आयु में विधुर का जीवन व्यतीत करना पड़ता है ....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ शुक्र फलम....
Yadi सप्तम भाव में शुक्र हो तो जातक के चरित्र को छोड़ कर अन्य फल शुभ ही होते हैं...कुंडली में शुक्र धनेश और सप्तमेश होता है, फलत: सप्तम भाव में वह बलवान हो जाता है..(शुक्र सप्तम भाव का प्रबल कारक है ) यदि शुक्र उच्च का हो तो अमीर घराने की एवं सुंदर पत्नी मिलती है ...मेष, मिथुन और तुला राशी हो तो पुरुष की भांति सुन्दरता लिए पत्नी मिलती है...जो व्यव्हार कुशल, विदुषी, एवं चतुर होती है तथा कुटुम्बी जानो के साथ प्रेमपूर्वक रहती है ऐसा जातक अपनी पत्नी को प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता है ...पत्नी भी जातक पर अपना अधिकार जमा लेती है तथा अल्प संतान की ही माता बनती है ...ऐसी स्त्री को अछ्छे से पता होता है की उसे अपने पति को कैसे वश में करना है अत: वह पूर्णता पति पर अधिकार जमा लेती है...ऐसा जातक अत्यधिक कामुकता के कारन अपना स्वास्थ्य क्षीण कर लेता है ...यदि स्जिघ और कुम्भ राशी में शुक्र हो तो पत्नी माध्यम कद और स्थूल देह की, बुद्धिमती तथा प्रसन्न रहने वाली, धनु राशी में शुक्र हो तो लम्बे कद की, सुंदर धैर्य रखने वाली तथा बनाव-श्रृंगार को अधिक महत्त्व देने वाली,, जल राशी में शुक्र हो तो स्वार्थी, कलह प्रिय व कुटुंब से अलग रहने वाली तथा खुला हाथ खर्च करने वाली व सत्ता अपने हाथ में रखने वाली होती है....
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्त्मस्थ शनि फलम...
यदि सप्तम भाव में शनि हो तो जीवन साथी देर से अथवा बड़ी आयु वाला या विजातीय होता है ...स्त्री की कुंडली में शनि सप्तम में हो तो विधुर हो गए व्यक्ति के साथ विवाह होता है...पति आयु में बड़ा, धनी, मणि, और प्रेम करने वाल होता है...यहाँ ज्ञातव्य है की शनि प्रेम के प्यासे होते हैं उसी तरह शनि प्रधान जातक आजीवन प्रेम और अपनेपन के लिए तरसते रहते हैं....१००० अपनों की भीड़ में भी अपने को अकेला पाते हैं.... जल राशी अथवा अग्नि राशी का शनि एक ही विवाह का योग बनत है विचार वैमनस्य होने पर वाकयुद्ध होने तक ही नौबत आती है किन्तु फिर मेल-मिलाप हो जाता है ...जीवन साथी सुहृदय होने से गृहस्थ सुख अच्छा मिलता है लेकिन अर्थाभाव बना रहता है ..शनि आभाव के सूचक है अत: जिस भाव में स्थित हो उसकी वृद्धि ...और जिस भाव पर उनकी दृष्टि (तृतीय , सप्तम, दशम.) हो उस भाव का नाश करते हैं...ऐसे जातक का येन-केन प्रकरेण जीवन व्यतीत होता है लेकिन अंतिम परिणाम सुखद होता है क्युकी ऐसा जाता अंत में निखर कर शुद्ध कंचन बन जाता है....यही शनि की सबसे बड़ी खूबी है है की वे इन्सान को समस्त कष्ट देकर उसकी धैर्य शक्ति बढ़ाते हैं और उसे स्वर्ण से कंचन बना कर बेशकीमती बना देते हैं अत: शनि प्रदत्त कष्टों से किसी को घबराना नहीं चाहिए...जीवन के तमाम उतार-चढाव बने रहते हैं ...स्व-राशी का शनि अथवावृषभ एवं कन्या का शनि द्विभार्य योग.(दो विवाह का ) बनता है ऐसी अवस्था में तलाक हो कर पुन: विवाह होता है ...मिथुन, तुला, कुम्भ, में शनि होने से संतान कुछ देर से अथवा संतान के जनम में काफी अंतर होता है...उच्च का शनि दुसरे विवाह की स्थिति में श्रेष्ठ रहता है ....
सप्त्मस्थ राहु फलम
प्राय: सप्तम भाव में राहु के अशुभ फल ही प्राप्त होते हैं...वाही स्थिति केतु की होती है ...आचार्यो के मतानुसार पूर्व जनम के दुस्कृत्यो का परिणाम सप्तम का राहु होता है ....अशुभ कर्मो के परिणाम स्वरुप राहु कुंडली में सप्त्मस्थ होता है ...ऐसे जातक का विवाह नहीं होता अथवा विवाह हो भी जाये तो प्रेम नहीं रहता ...ऐसा विवाह न हो कर...विवाह का पवित्र बंधन न हो कर मात्र एक देह वासना शांत करने का अनुबंध माध्यम होता है ..हाँ स्त्री राशी का राहु शुभ फल देता है विवाह शीघ्र हो जाता है और प्रेम भी बना रहता है ...सामान्यता सप्त्मस्थ राहु के निम्न फल अनुभव में आते हैं ...देर से विवाह, अंतरजातीय विवाह पुनर्भु स्त्री , अधिक आयु वाली स्त्री, विधवा से अवैध सम्बन्ध जोड़ना या विवाह होना अदि ...
सूर्य .....यदि सप्तम भाव में सूर्य हो तो जातक के विवाह में विलम्ब होता है दाम्पत्य जीवन का पूर्वार्ध प्राय: कलहपूर्ण होता है पति-पत्नी के बीच में विचार वैमनस्य रहता है ...मिथुन, तुला कुम्भ का सूर्य जातक को शिक्षा विभाग से सम्बंधित करता है तथा इसी में उसकी उन्नति होती है ऐसा जातक कुशल नीतिज्ञ होता है तथा उसे एक या दो संतान होती है..जीवन के पूर्वार्ध में ही जातक के चश्मा चढ़ने की नौबत आ जाती है ...अग्नि राशी का सूर्य विवाह में देरी करता है अपवाद रूप से दो विवाह होते हैं ऐसे जातक के सर पर तालू में बल कम होते हैं...ऐसे जातक की प्रवृत्ति स्वतंत्र रहने की होती है...यदि सूर्य स्त्री राशियों में हो तो व्यापार से लाभ मिलता है..और राजनीती में जाने से सफलता मिलती है ...
यदि सूर्य जल राशी का हो तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में उन्नति करता है सिंचाई विभाग में अधिकारी होता है अथवा विज्ञानं के क्षेत्र में चला जाता है...पुरुष राशी का सूर्य हो तो जीवन पर्यंत उतर-चढाव बने रहते हैं...संतान कम होती है ...
स्त्री राशी का सूर्य अधिक संतान देता है प्राय: सप्तमस्थ सूर्य के निम्न फल अनुभव में आते हैं पति अत्थ्वा पत्नी प्रभावशाली, व्यव्हार कुशल, आपातकाल में एक दुसरे के सहायक, अतिथि सेवक, तथा नौकरों से प्रेम से कार्य करने में कुशल...ऐसे जातकों को उद्योग या साझेदारी में भी सफलता मिलती है
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुम्भ ....ये पुरुष राशी होती हैं ...और वृषभ, कर्क,कन्या,वृश्चिक,मकर, और मीन स्त्री संज्ञक राशी...
मेष, कर्क, तुला, मकर...ये चर राशी
वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ..ये स्थिर राशी
मिथुन, कन्या, धनु, और मीन....द्वि स्वाभाव राशी..
मेष, सिंह धनु,....अग्नि राशी..
कर्क, वृश्चिक, और मीन.....जल तत्व..
वृषभ, कन्या और मकर....पृथ्वी तत्व...
मिथुन, तुला, और कुम्भ.....वायु तत्व...
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ चंद्रमा फल....
यदि सप्तम भाव में चन्द्र हो तो जातक को दाम्पत्य जीवन का पूर्ण सुख प्राप्त नहीं होता है ..उच्चस्थ चन्द्र द्विभार्य योग बनाता है ...अर्थत जातक या जातिका के वैवाहिक जीवन में कुछ अड़चन ..परेशानी, मत विभिन्नता के कारन पति-पत्नी का अलग रहना...अथवा तलक जैसी नौबत आती हैं ..अत: २१ से २४ वर्ष की आयु तक विवाह से बचे अथवा कोई उपाय करें....हालाँकि ऐसे जातक का विवाह के शीघ्र बाद भाग्योदय होता है और पत्नी के रहने तक उन्नति होती रहती है ..पत्नी से अलगाव या मृत्यु पश्चत स्थिति विपरीत बन जाती है ...ऐसे जातक के जीविका के साधन भी बदलते रहते हैं ..चन्द्र चंचल होता है सौर मंडल में सर्वाधिक गति वाला गृह होने के कारन मन, धन का कारक होता है...जीवन साथी का चंचल होना स्वाभाविक है...और यहीं से भूले प्रारंभ होती हैं...इसलिए इस उपरोक्त समय से बचना चाहिए अथवा कोई उपाय कर लेना चाहिए....ऐसे जातक मन, व्यवसाय, नौकरी कुछ भी स्थिर नहीं रह पाती ...
जिस जातक की कुंडली में सप्तम स्थान में चन्द्र हो उसे किरणे की दुकान, दूध, मेडिकल स्टोर , होटल, ढाबा, बेकरी , बीमे का कार्य, चंडी, इत्यादी का कार्य लाभप्रद रहता है...और अगर सप्ताम्स्थ चन्द्र पर गुरु जैसे सात्विक गृह की दृष्टि हो तो सोने पे सुहागा...उपरोक्त कार्यो के आलावा प्रिंटिंग, प्रकाशन,किसी सन्स्थ का अध्यक्ष,..आदि...अत: ऐसे जातको को इस और विचार करना चाहिए...पुरुष राशी का चन्द्र स्व-पत्नी में आसक्ति बनाये रखता है ...स्त्री राशी का चन्द्र व्यभिचार की और आकृष्ट करता है ...यदि चन्द्र अग्नि राशी का हो तो जीवन साथी का चेहरा गोल होता है और कुछ समय पश्चत तुन्दालता आती है...जातक majakiya swabhv का होता है..हर समय खुश रहने वाल...लेकिन भावुक...भी होता है......वायु तत्व का चन्द्र हो तो जीवन साथी दार्शनिक, ज्ञानी और प्रभावशाली होता है
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ मंगल फल ...
सप्तम भाव में मंगल हो तो जातक की स्त्री और स्वयं जातक दोनों ही उग्र स्वाभाव के होते हैं...अपने आपको एक दुसरे श्रेष्ठ दिखाना इनकी आदत और दिनचर्या में शामिल होती है....अपनी कही घटिया बात..अल्प ज्ञान की बात को सर्वोपरि मन न और दुसरो की कही हुई उत्तम बात में निम्नता देखना इनकी खासियत होती है ...ये मगली योग भी कहलाता है मंगली योग (१, ४, ७, ८, १०, 12) एसा मंगल होने से योग बनता है ...ऐसे जातक के जीवन में दाम्पत्य जीवन में कलह -कलेश का वातावरण बन न कोई बड़ी बात नहीं...अहेंकर इतना की अपने आगे किसी को कुछ न समझना ...और अपना प्रभुत्व स्थापित करना इनका मेन उद्देश्य होता है ....
मगल सप्तम भाव में किशी भी राशी का हो...एक फल बहुत अच्छे से समझ आया की ऐसा जातक हर कम करने को तत्पर रहता है लेकिन उसे सफलता पूर्वक पूरा करने में सक्षम नहीं होता विघ, बाधा, रोक-रूकावट इतनी होती हैं की उसकी हिम्मत पस्त हो जाती है.....जिन लोगो को ऐसा अनुभव हो उन्हें तत्काल कोई शुभ मुहूर्त देख मंगल के जप करवा इसकी शांति का लेनी चाहिए ...और अपने मित्रो, अपने से छोटो को प्रेम पूर्वक बोलना चाहिए...अगर वे किसी भी प्रकार अपने किसी कार्य -उद्योग में सफल हो जाते हैं तो प्रतिपक्षियो से स्पर्धा...झगडे टंटे चलते रहते हैं ....
यदि मंगल अग्नि राशी का हो तो प्रेस, का धंधा लाभ दायक रहता है .....प्रथ्वी तत्व का हो तो भवन निर्माण, खेतीबाड़ी, का व्यवसाय...लाभ दायक..., वायु तत्व में हो तो वाहन चालक, वाहन को मरम्मत करने का कम, वायु यान चलाने का कम अर्थात पायलट तथा जल तत्व का मंगल हो सर्जन और इन्जिनिएरिंग जैसे कार्य लाभदायक रहते हैं ..यदि स्त्री राशी का सप्त्मष्ठ मंगल हो तो जातक संकटकाल में घबराता है ...लेकिन पुरुष राशी में हो तो धैर्यशाली व सहिष्णु होता है ऐसे जातक के मित्र बहुत कम होते हैं, पत्निसुख कम तथा साले का सुख भी अल्प होता है..... इस भाव का मंगल डाक्टरों , सर्जन , पुलिस अधिकारीयों के लिए शुभ फलदायक होता है फैज्दारी के वकीलों को ऐसा मंगल यशोभागी बनता है ..इतने पर भी जातक में कामेच्छा तीव्र होती है ..वो कोई अनुचित कार्य करे तो वो उजागर हो जाता है ...झगडे झंझट तो चलते ही रहते हैं....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ बुध का फल......
यदि सप्तमस्थ बुध हो तो जातक को स्त्री सुख तो मिलता है ..लेकिन रति सुख के समय ऐसा जातक शीघ्र ही स्खलित हो जाता है ..विवाह के समय झगडे चलते हैं ...ऐसा जातक लेखक हो तो समय संकट में भी व्यतीत होता है हाँ, स्त्री के मामले में जातक सौभाग्यशाली कहा जा सकता है .....धन संग्रह करने की रूचि उसमे स्वाभाविक होती है तथा पति के प्रत्येक कार्य में उसे सहयोग करती है ऐसे जातक की स्त्री पुरुषाकृति की तथा कर्कश वाणी बोलने वाली होती है ...
सप्त्मस्थ गुरु का फल...
यदि गुरु सप्तमस्थ हो तो शुभ फल प्राप्त होते हैं ऐसा प्राचीन मनीषयों का मत है लेकिन अनुभव में शुभ फल कम अशुभ फल अधिक मिले हैं अग्नि राशियों और मिथुन राशी का सप्त्मस्थ गुरु शिक्षा के लिए शुभ फलदाता होता है कारण मिथुन राशी बौद्धिक राशी के अंतर्गत आती है ऐसा जातक पढ़ाकू होता है ..पत्नी शुद्ध सात्विक विचारो की मलती है ...ऐसा जाता उच्च शिक्षा प्राप्त कर शिक्षक, न्यायाधीश , या वकील बन जाता है शिक्षा-विभाग में नौकरी करने वालो तथा वकीलों के लिए यह योग शुभ होता है ..जल राशी या कन्या राशी में रहने पर बुध सांसारिक सुख में न्यूनता लता है ..प्राय: पति-पत्नी में सम्बन्ध मधुर नहीं रहते यदि गुरु अशुभ प्रभाव में हो तो जीवन-साथी जातक को छोड़ कर भाग जाता है या तलक की नौबत आ जाती है...यदि गुरु शनि से प्रभावित हो तो जातक को विवाह न करने की इच्छा बनती है ...यदि राहु साथ में हो तो विवाह प्रतिबंधक योग निष्पन्न हो जाता है अपवाद रूप शादी हो भी जाये तो पति-पत्नी में अलगाव अथवा तलक की नौबत आ जाती है...लेकिन तलक नहीं होता...एक-दुसरे से अलग रहते हैं....नीच का अथवा तुला राशी में स्थित गुरु द्विभार्या योग बनत है....यानि दो विवाह होते हैं...पुएरुष राशी का गुरु हो तो जातक पत्नी को मात्र भोग्या समझता है ...जातक की दृष्टि में पत्नी का दर्जा निम्न श्रेणी का नौकर जैसा होता है...वो अपनी पत्नी को मात्र कामवासना शांत करने का साधन समझता है....यदि स्त्री राशी का गुरु हो तो जातक का व्यापर की और रुझान होता है तथा वह अपनी पत्नी और बच्चों से अत्यधिक प्रेम करता है पत्नी भी पतिपरायण होती है..तहत प्रत्येक कार्यों में मंत्री की भांति सलाह देती है सेवक की तरह सेवा करती है और माता की तरह पालन करती है ऐसे जातक को मध्य आयु में विधुर का जीवन व्यतीत करना पड़ता है ....क्रमश:
ॐ श्री गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्तमस्थ शुक्र फलम....
Yadi सप्तम भाव में शुक्र हो तो जातक के चरित्र को छोड़ कर अन्य फल शुभ ही होते हैं...कुंडली में शुक्र धनेश और सप्तमेश होता है, फलत: सप्तम भाव में वह बलवान हो जाता है..(शुक्र सप्तम भाव का प्रबल कारक है ) यदि शुक्र उच्च का हो तो अमीर घराने की एवं सुंदर पत्नी मिलती है ...मेष, मिथुन और तुला राशी हो तो पुरुष की भांति सुन्दरता लिए पत्नी मिलती है...जो व्यव्हार कुशल, विदुषी, एवं चतुर होती है तथा कुटुम्बी जानो के साथ प्रेमपूर्वक रहती है ऐसा जातक अपनी पत्नी को प्राणों से भी अधिक प्रिय समझता है ...पत्नी भी जातक पर अपना अधिकार जमा लेती है तथा अल्प संतान की ही माता बनती है ...ऐसी स्त्री को अछ्छे से पता होता है की उसे अपने पति को कैसे वश में करना है अत: वह पूर्णता पति पर अधिकार जमा लेती है...ऐसा जातक अत्यधिक कामुकता के कारन अपना स्वास्थ्य क्षीण कर लेता है ...यदि स्जिघ और कुम्भ राशी में शुक्र हो तो पत्नी माध्यम कद और स्थूल देह की, बुद्धिमती तथा प्रसन्न रहने वाली, धनु राशी में शुक्र हो तो लम्बे कद की, सुंदर धैर्य रखने वाली तथा बनाव-श्रृंगार को अधिक महत्त्व देने वाली,, जल राशी में शुक्र हो तो स्वार्थी, कलह प्रिय व कुटुंब से अलग रहने वाली तथा खुला हाथ खर्च करने वाली व सत्ता अपने हाथ में रखने वाली होती है....
ॐ गणेशाम्बा गुरुभ्यो नम:
सप्त्मस्थ शनि फलम...
यदि सप्तम भाव में शनि हो तो जीवन साथी देर से अथवा बड़ी आयु वाला या विजातीय होता है ...स्त्री की कुंडली में शनि सप्तम में हो तो विधुर हो गए व्यक्ति के साथ विवाह होता है...पति आयु में बड़ा, धनी, मणि, और प्रेम करने वाल होता है...यहाँ ज्ञातव्य है की शनि प्रेम के प्यासे होते हैं उसी तरह शनि प्रधान जातक आजीवन प्रेम और अपनेपन के लिए तरसते रहते हैं....१००० अपनों की भीड़ में भी अपने को अकेला पाते हैं.... जल राशी अथवा अग्नि राशी का शनि एक ही विवाह का योग बनत है विचार वैमनस्य होने पर वाकयुद्ध होने तक ही नौबत आती है किन्तु फिर मेल-मिलाप हो जाता है ...जीवन साथी सुहृदय होने से गृहस्थ सुख अच्छा मिलता है लेकिन अर्थाभाव बना रहता है ..शनि आभाव के सूचक है अत: जिस भाव में स्थित हो उसकी वृद्धि ...और जिस भाव पर उनकी दृष्टि (तृतीय , सप्तम, दशम.) हो उस भाव का नाश करते हैं...ऐसे जातक का येन-केन प्रकरेण जीवन व्यतीत होता है लेकिन अंतिम परिणाम सुखद होता है क्युकी ऐसा जाता अंत में निखर कर शुद्ध कंचन बन जाता है....यही शनि की सबसे बड़ी खूबी है है की वे इन्सान को समस्त कष्ट देकर उसकी धैर्य शक्ति बढ़ाते हैं और उसे स्वर्ण से कंचन बना कर बेशकीमती बना देते हैं अत: शनि प्रदत्त कष्टों से किसी को घबराना नहीं चाहिए...जीवन के तमाम उतार-चढाव बने रहते हैं ...स्व-राशी का शनि अथवावृषभ एवं कन्या का शनि द्विभार्य योग.(दो विवाह का ) बनता है ऐसी अवस्था में तलाक हो कर पुन: विवाह होता है ...मिथुन, तुला, कुम्भ, में शनि होने से संतान कुछ देर से अथवा संतान के जनम में काफी अंतर होता है...उच्च का शनि दुसरे विवाह की स्थिति में श्रेष्ठ रहता है ....
सप्त्मस्थ राहु फलम
प्राय: सप्तम भाव में राहु के अशुभ फल ही प्राप्त होते हैं...वाही स्थिति केतु की होती है ...आचार्यो के मतानुसार पूर्व जनम के दुस्कृत्यो का परिणाम सप्तम का राहु होता है ....अशुभ कर्मो के परिणाम स्वरुप राहु कुंडली में सप्त्मस्थ होता है ...ऐसे जातक का विवाह नहीं होता अथवा विवाह हो भी जाये तो प्रेम नहीं रहता ...ऐसा विवाह न हो कर...विवाह का पवित्र बंधन न हो कर मात्र एक देह वासना शांत करने का अनुबंध माध्यम होता है ..हाँ स्त्री राशी का राहु शुभ फल देता है विवाह शीघ्र हो जाता है और प्रेम भी बना रहता है ...सामान्यता सप्त्मस्थ राहु के निम्न फल अनुभव में आते हैं ...देर से विवाह, अंतरजातीय विवाह पुनर्भु स्त्री , अधिक आयु वाली स्त्री, विधवा से अवैध सम्बन्ध जोड़ना या विवाह होना अदि ...
Saturday, 29 December 2012
शुभ प्रभात .......30/12/2012.....टाइम ..06:34
हम हमेशा शर्मिंदा ही रहेंगे ....क्युकी ऐसी मर्दानगी।।हमें हर रोज देखने को मिलेगी। इसलिए हम हमेशा शर्मिंदा रहेंगे। रोज अख़बार में डरते-डरते देखेंगे की कुछ और वीर-धीर पुरषों ने किसी मासूम पर अपनी मर्दानगी दिखाई।।जब देखेंग की हाँ ...हम फिर शर्मिंदा होंगे ..और ये सिलसिला मर्दानगी का और शर्मिंदगी का निरंतर चलता रहेगा।। जय बाबा महाकाल
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